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तमिलनाडु के प्रस्तावित पट्टिनापक्कम सचिवालय कॉम्प्लेक्स के विरोध में काला झंडा मार्च निकालेंगे मछुआरे

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चेन्नई, 4 अक्टूबर (आईएएनएस)। पट्टिनापक्कम के 10 तटीय गांवों के मछुआरे रविवार को तमिलनाडु सरकार के उस प्रस्ताव के विरोध में काले झंडे के साथ मार्च करेंगे, जिसमें इस इलाके की जमीन का इस्तेमाल नई विधानसभा और सचिवालय परिसर बनाने के लिए करने की बात कही गई है।

माइलापुर क्षेत्र की सभी मछुआरा ग्राम पंचायत परिषद की ओर से आयोजित यह विरोध प्रदर्शन मुल्लिकुप्पम-श्रीनिवासपुरम लूप रोड जंक्शन पर किया जाएगा। मछली पकड़ने वाले इलाकों में रहने वाले लोग इस प्रोजेक्ट के विरोध में समुद्र तट पर काले झंडे भी फहराएंगे।

परिषद ने राज्य सरकार से जीओ (सरकारी आदेश) 564 को वापस लेने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इसी आदेश के तहत पट्टिनापक्कम में प्रस्तावित विधानसभा और सचिवालय कॉम्प्लेक्स बनाने की योजना है। मछुआरों का कहना है कि यह जमीन पारंपरिक मछुआरा समुदाय के कल्याण, पुनर्वास और आवास की जरूरतों के लिए ही आरक्षित रहनी चाहिए।

रविवार का प्रदर्शन इस प्रस्ताव के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों की कड़ी में सबसे नया है। मछुआरों ने 29 सितंबर को भी विरोध प्रदर्शन किया था और सरकार से आदेश वापस लेने तथा यह सुनिश्चित करने की मांग की थी कि जमीन तटीय समुदाय के लिए उपलब्ध रहे।

सरकार के रुख में कोई बदलाव न होने पर ग्राम परिषद ने काले झंडे दिखाकर विरोध करने के जरिए अपना अभियान तेज करने का फैसला किया।

परिषद के अनुसार, सर्वे नंबर 4592 और 4593 के तहत आने वाली जमीन मूल रूप से 10 अक्टूबर 1957 के जीओ एमएस नंबर 3313 के जरिए हासिल की गई थी। इसे खास तौर पर इलाके में रहने वाले मछुआरों के पुनर्वास और लंबे समय तक रहने की व्यवस्था के लिए लिया गया था।

परिषद का तर्क है कि इस प्रॉपर्टी का इस्तेमाल सरकारी प्रशासनिक कॉम्प्लेक्स के लिए करना उस मकसद के खिलाफ होगा, जिसके लिए इसे हासिल किया गया था और इससे मछली पकड़ने वाले समुदाय को पहले दिए गए आश्वासनों को भी ठेस पहुंचेगी।

मछुआरों ने इलाके से निवासियों को हटाने के किसी भी कदम का विरोध करते हुए राज्य के जलवायु जोखिम आकलन का भी हवाला दिया है। उनका दावा है कि इन आकलनों से पता चलता है कि 2050 और 2100 तक समुद्र का जलस्तर बढ़ने के अनुमान के बावजूद मुल्लिकुप्पम का इलाका काफी हद तक सुरक्षित रहेगा।

मछली पकड़ने वाले समुदाय ने सरकार से आग्रह किया है कि वह ‘कोस्टल रेगुलेशन जोन नोटिफिकेशन, 2019’ के तहत इस इलाके को आधिकारिक तौर पर मछुआरों के रिहायशी जोन के रूप में मान्यता दे।

विरोध करने वालों का कहना है कि मछली पकड़ने वाले समुदायों से पारंपरिक रूप से जुड़ी तटीय जमीन को बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए इस्तेमाल करने के बजाय, उनके रहने और रोजी-रोटी की जरूरतों के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

उन्होंने सरकार से प्रस्तावित आवंटन पर फिर से विचार करने और सचिवालय प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने से पहले निवासियों के साथ बातचीत करने की अपील की है।