नई दिल्ली, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष लगातार चुनाव आयोग को घेरने की कोशिश कर रहा है। इस बीच चुनाव आयोग के पूर्व संयुक्त निदेशक और चीफ ऑफ प्रोटोकॉल मोहम्मद अमीन ने विपक्ष के सारे आरोपों की हवा निकाल दी है। पूर्व अधिकारी ने साफ कहा कि चुनाव आयोग के भीतर मतभेद और असहमति कोई नई बात नहीं है, यह पहले भी होता रहा है। गिल से लेकर अशोक लवासा तक, कई मौकों पर आयुक्तों के बीच वैचारिक टकराव सामने आए हैं, लेकिन विपक्ष और मीडिया का एक धड़ा जानबूझकर इस सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया को बड़ा विवाद बनाकर देश में हो-हल्ला मचा रहा है।
चुनाव आयोग के पूर्व संयुक्त निदेशक और प्रोटोकॉल प्रमुख मोहम्मद अमीन ने कहा, “आयोग के भीतर मतभेदों का इतिहास नया नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले भी कई अवसरों पर आयुक्तों के बीच वैचारिक टकराव सामने आते रहे हैं, चाहे वह मिस्टर गिल के कार्यकाल का दौर रहा हो या अन्य आयुक्तों से जुड़े मामले हों।”
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सुनील अरोड़ा के मुख्य चुनाव आयुक्त रहते हुए अशोक लवासा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था, जो आपसी असहमति का ही परिणाम था। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि मतभेदों के बावजूद आयोग में अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लेने की परंपरा रही है। यदि सहमति नहीं बनती है तो बहुमत यानी दो बनाम एक के आधार पर फैसला लिया जाता है।
उन्होंने आगे कहा कि पहले भी दो सदस्यीय आयोग की व्यवस्था लागू की गई थी, लेकिन इस तरह का विवाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर सामने आया है। उनका कहना है कि यह मामला अब प्रेस और मीडिया में चर्चा का विषय बन गया है और देशभर में इसको लेकर काफी चर्चा हो रही है।
उन्होंने कहा कि उन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि आखिर इसके पीछे मंशा क्या है। बेहतर होगा कि आयोग के सभी सदस्य एक मंच पर आकर एकजुटता के साथ देश को संबोधित करें। हर मतदाता सच्चाई जानना चाहता है, क्योंकि लोकतंत्र में असली हितधारक मतदाता ही हैं और चुनाव आयोग मतदाताओं के प्रति जवाबदेह है।
मोहम्मद अमीन ने कहा कि आयोग को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि उनके बीच कोई टकराव नहीं है और सभी एकजुट हैं। यही देश के हित में बेहतर होगा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल आयोग के लिए द्वितीयक हितधारक हैं। देश जानना चाहता है कि आयोग के भीतर क्या चल रहा है, इसलिए बेहतर है कि आयोग खुद ही स्थिति को स्पष्ट करे। बाहर से, प्रेस या मीडिया के माध्यम से ऐसी खबरों का आना ठीक नहीं है और यह देश के लिए उचित नहीं है।
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह के मामले का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले उनकी पत्नी का नाम दो जगह मतदाता सूची में दर्ज था। एक नामांकन साउथ एवेन्यू में था और दूसरा उनके गृह क्षेत्र सुल्तानपुर में। आयोग के पास पहले से ही केंद्रीय सर्वर मौजूद है, जिसमें यदि समान डेटा का मिलान किया जाए तो दोहरी प्रविष्टियों को हटाया जा सकता है। इसी प्रक्रिया के तहत उनका नाम एक जगह से हटाया गया, लेकिन इसे लेकर अनावश्यक हंगामा किया गया कि उनकी पत्नी का नाम मतदाता सूची से निकाल दिया गया है, जबकि यह एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी।
मोहम्मद अमीन ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान राज्य स्तर पर अधिसूचनाएं जारी होती हैं और राज्यों को सर्वर खोलने का अधिकार प्राप्त होता है, ताकि मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया पूरी की जा सके।
उन्होंने बताया कि मतदाता सूची के लिए पंजीकरण की एक निश्चित समय-सीमा होती है। प्रारूप प्रकाशन के बाद भी मतदाताओं को आपत्ति दर्ज कराने का समय मिलता है और अंतिम प्रारूप के बाद भी संशोधन की प्रक्रिया जारी रहती है। इसका विधिवत नोटिफिकेशन भी प्रकाशित किया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया समयबद्ध कार्यक्रम के तहत चलती है और केंद्र द्वारा देशभर के सभी केंद्रों के लिए सर्वर खोलने की व्यवस्था की जाती है। गोवा के मामले का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वहां 97 मतदाताओं का सत्यापन नहीं हो पाया था। इसका कारण सर्वर में तकनीकी समस्या या समय का अभाव हो सकता है, हालांकि इस बारे में वे निश्चित नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि यह मामला पहले ही सर्वोच्च न्यायालय में दायर किया जा चुका है और शीर्ष अदालत ने आयोग को निर्देश दिया है कि उस दौरान हुई बैठकों से जुड़ी सभी फाइलें और कार्यवाही विवरण प्रस्तुत किए जाएं। चूंकि मामला अब अदालत में विचाराधीन है, इसलिए आरोप-प्रत्यारोप के बजाय बेहतर होगा कि न्यायालय के फैसले का इंतजार किया जाए।
