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सीजेपी ने युवाओं को आवाज उठाने का साहस दिया : सैम पित्रोदा (आईएएनएस साक्षात्कार)

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वॉशिंगटन, 15 अक्टूबर (आईएएनएस)। इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के प्रमुख सैम पित्रोदा ने गुरुवार को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और बदलाव लाने की उसकी क्षमता पर भरोसा जताया। उन्होंने कहा कि युवाओं के इस छोटे से समूह ने आवाज उठाने और जिम्मेदारी लेने का साहस दिखाया है। भले ही कुछ मौकों पर उनकी भाषा उचित नहीं रही हो, लेकिन उन्होंने दूसरों के लिए भी अपनी बात रखने के अवसर खोले हैं।

आईएएनएस को दिए एक विशेष साक्षात्कार में पित्रोदा ने कहा कि सीजेपी और छात्र आंदोलन को देश में चल रही व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रक्रियाओं के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने लोकतंत्र, चुनावी व्यवस्था पर भरोसे, युवाओं की भूमिका, शिक्षा, रोजगार, आर्थिक असमानता, विपक्षी एकजुटता और भारत की विदेश नीति समेत कई मुद्दों पर अपनी राय रखी।

आईएएनएस: केंद्र सरकार के खिलाफ कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को आप किस नजरिए से देखते हैं?

सैम पित्रोदा: सीजेपी के बारे में बात करने से पहले हमें यह समझना होगा कि देश में क्या हो रहा है। कॉकरोच जनता पार्टी और छात्र आंदोलन एक बड़ी पहेली का हिस्सा हैं। ये अकेले मुद्दे नहीं हैं। मेरे विचार से एक साथ कई घटनाएं हो रही हैं, जो मिलकर एक व्यापक तस्वीर बना रही हैं।

पहली बात लोकतंत्र पर हो रहे व्यापक हमले की है। अलग-अलग लोग इसे अलग नजरिए से देख सकते हैं, लेकिन जब संस्थानों पर कब्जा करने की कोशिश होती है, नागरिक समाज को कमजोर किया जाता है, मीडिया को नियंत्रित किया जाता है और एक सत्तावादी सोच को बढ़ावा मिलता है, तब लोकतंत्र कई तरह से प्रभावित होता है। जब हर फैसला प्रधानमंत्री कार्यालय, प्रधानमंत्री या जिसे ‘डबल इंजन’ सरकार कहा जाता है, उसके इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर सवाल खड़े करता है। लोगों की राय सामने नहीं आ पाती। लोग बोलने से डरते हैं और उन्हें लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जाएगी। अगर आप कोई अलग राय रखते हैं तो आपके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की कार्रवाई हो सकती है या मुकदमा दर्ज हो सकता है। यह भी उसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है।

दूसरा बड़ा मुद्दा चुनावों से जुड़ा है। एक तरफ लोकतंत्र पर हमले की बात है तो दूसरी तरफ बहुत से लोगों को लगता है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं हुए। उन्हें लगता है कि उनके वोट की गिनती नहीं हुई। मतदाता पंजीकरण, पात्रता, वोटों की गिनती, प्रक्रिया, ईवीएम, मतदाता सूची और यहां तक कि मतपेटियों को इधर-उधर ले जाने, बंद रखने, खोलने या ट्रक में डालने जैसी घटनाओं ने अविश्वास पैदा किया है। लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है। यह सही भी हो सकता है और गलत भी। किसी का नजरिया अलग हो सकता है, लेकिन आरोप-प्रत्यारोप का जो सिलसिला चलता है, वह लोकतंत्र पर हमले का एक उदाहरण बन जाता है।

चर्चा मुद्दों पर होने के बजाय व्यक्तियों पर हमले में बदल जाती है। इसी पृष्ठभूमि में सीजेपी सामने आती है। छात्रों के एक छोटे समूह को उस समय ठेस पहुंची, जब किसी ने उन्हें कॉकरोच कहा। वे एक सही समय पर एक साथ आए, क्योंकि उस समय परीक्षाओं में गड़बड़ी, पेपर लीक, खराब बुनियादी ढांचे, शिक्षा की बदहाली, बढ़ती फीस, कोचिंग संस्थानों और बेरोजगारी जैसे मुद्दे मौजूद थे। ये सभी ऐसे मुद्दे हैं, जो अगली पीढ़ी को प्रभावित करते हैं। इन मुद्दों ने युवाओं को एकजुट किया। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने निडर होकर अपनी बात रखी और साहस दिखाया।

पित्रोदा ने कहा कि कुछ लोगों ने जोरदार तरीके से अपनी बात कही। कुछ ने गलत भाषा का इस्तेमाल किया। मैं इसका समर्थन नहीं करता, लेकिन उनके गुस्से को समझा जा सकता है। इससे दूसरों के लिए भी कई अवसर खुले। जो लोग पहले बोलने से डरते थे, उन्हें हिम्मत मिली। नागरिक समाज को लगा कि शायद अब कुछ बदलाव होगा। छात्र आंदोलन और सीजेपी का आंदोलन निडर होकर विपक्षी आवाज उठाने, साहस और जागरूकता से जुड़ा है। मैंने अपने एक लेख में इसे ‘भारतीय मानसून’ कहा था, जो कुछ हद तक ‘अरब स्प्रिंग’ जैसा है। इसका श्रेय युवाओं को जाता है। उन्होंने आगे बढ़कर जिम्मेदारी ली और समाज को जागरूक किया। उनके कुछ कदम सही रहे होंगे और कुछ गलत, लेकिन उन्होंने समाज को एकजुट करने में भूमिका निभाई। तीसरी बात अल्पसंख्यकों, अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), दलितों और आदिवासियों से जुड़ी है। उन्हें लगता है कि उनकी आवाज नहीं सुनी जा रही और अर्थव्यवस्था में उन्हें उचित हिस्सेदारी नहीं मिल रही। उन्हें हाशिये पर रखा जा रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि का लाभ बहुत कम लोगों को मिल रहा है, जबकि आर्थिक पिरामिड के निचले पायदान पर मौजूद लोगों को इसका फायदा नहीं दिख रहा। उनकी मजदूरी नहीं बढ़ी है, महंगाई बढ़ी है और क्रय शक्ति कम हुई है। यह समानता, गुणवत्ता और अन्याय का मुद्दा है। अल्पसंख्यकों पर हमलों के कारण कई लोगों में असुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता पैदा हुई है। छात्र आंदोलन ने उन्हें भी अपनी आवाज उठाने का अवसर दिया। अब केवल छात्र ही नहीं, बल्कि दूसरे वर्गों के लोगों को भी लगने लगा कि उनकी बात सुनी जा सकती है। चौथी बात सरकार के प्रदर्शन से जुड़ी है। बहुत सारे वादे किए गए थे। उन वादों की सूची निकालकर देखिए कि कितने पूरे हुए। अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं है। विकास दर सात प्रतिशत है या जो भी आंकड़ा बताया जा रहा है, लेकिन सवाल यह है कि इसका फायदा किसे मिल रहा है? क्या आम लोगों को इसका लाभ दिखाई देता है या केवल कुछ लोगों को फायदा हो रहा है?

उन्होंने कहा कि आप देखते हैं कि 20 लोगों की संपत्ति सौ गुना बढ़ जाती है और आंकड़े अच्छे दिखाई देने लगते हैं, लेकिन इससे मजदूरों और आम लोगों की स्थिति में सुधार नहीं होता। इस प्रक्रिया में हम पर्याप्त रोजगार पैदा नहीं कर पाए हैं और संपत्ति का वितरण असमान बना हुआ है। शिक्षा व्यवस्था की हालत खराब है। हमारे स्कूलों में बच्चों को उचित मध्याह्न भोजन नहीं मिलता। स्कूलों की इमारतें जर्जर हैं और शिक्षक कई बार स्कूल नहीं पहुंचते। हमारी प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था भी ठीक नहीं हुई है। अगर आप पिछले 15 वर्षों के कामकाज को देखें, तो हो सकता है कि अच्छे हवाई अड्डे और सड़कें बनाई गई हों। लेकिन एक गरीब व्यक्ति कहता है कि हवाई अड्डे से उसका क्या लेना-देना? वह हवाई यात्रा नहीं करता। सड़कों से भी उसे क्या फायदा, जब उसके पास कार ही नहीं है? मेरे विचार से संपत्ति का वितरण पूरी तरह असंतुलित है। पांचवीं बात तकनीक से जुड़ी है। मीडिया, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के इस्तेमाल तथा नियंत्रण के कारण परिस्थितियां बदल रही हैं। आज भारत में अरबों लोग जुड़े हुए हैं। लगभग हर किसी के पास मोबाइल फोन है। इसका मतलब है कि लोगों को सूचना तक पहुंच मिल रही है। वे वीडियो देख रहे हैं और संवाद करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है, लेकिन इसी प्रक्रिया में गलत सूचनाएं भी बढ़ी हैं और हमले भी बढ़े हैं। तकनीक ने चुनाव प्रचार का तरीका बदल दिया है। यह केवल चुनाव प्रचार तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने विचारों को आगे बढ़ाने के अभियान पर भी लागू होता है। लोग खुलेआम झूठ बोलते हैं और उन्हें इसका अफसोस भी नहीं होता। हर कोई झूठ बोलता दिखाई देता है। लोग कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं। इससे लोगों के बीच भ्रम पैदा हुआ है।

सैम पित्रोदा ने कहा कि मेरे विचार से ये पांचों चीजें एक साथ चल रही हैं। पहली, लोकतंत्र पर हमला और चुनावी व्यवस्था पर अविश्वास। दूसरी, छात्र आंदोलन, साहस, निडर संवाद और जागरूकता। तीसरी, अल्पसंख्यकों, ओबीसी, दलितों और आदिवासियों की सशक्तिकरण तथा आर्थिक हिस्सेदारी की मांग। चौथी बात सरकार के प्रदर्शन की है। युवाओं के सवाल हैं कि उन्हें रोजगार कहां मिलेगा और अच्छी शिक्षा कहां मिलेगी? हर साल लगभग एक लाख बच्चे पढ़ाई के लिए भारत से विदेश जाते हैं। वे औसतन सालाना 50,000 डॉलर खर्च करते हैं, जो कुछ मामलों में एक लाख डॉलर तक हो सकता है। इस तरह बच्चों की शिक्षा पर करीब 50 अरब डॉलर सालाना देश से बाहर जा रहे हैं। इतने सबके बावजूद भारत अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा क्यों नहीं दे सकता? हमारे पास कई आईआईटी और आईआईएम हैं। हमें उदार कला शिक्षा के संस्थानों के साथ-साथ दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र, कला, संस्कृति, मनोविज्ञान और मानवशास्त्र जैसे विषयों की बेहतर शिक्षा देने वाले संस्थानों की भी जरूरत है। हमारे पास अच्छी कला शिक्षा क्यों नहीं है? हमारे बच्चों को इतनी बड़ी संख्या में विदेश क्यों जाना पड़ रहा है? 50-60 साल पहले ऐसा होना समझ में आता था। मैं खुद 62 साल पहले अमेरिका आया था। उस समय परिस्थितियां अलग थीं। आज भारत तरक्की कर रहा है और तकनीक भी उपलब्ध है। इसके बावजूद हमें हर साल लगभग एक लाख बच्चों को पढ़ाई के लिए विदेश भेजना पड़ रहा है। इसलिए सरकार के प्रदर्शन का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है। हमने बहुत सारे वादे किए, लेकिन उनमें से कई पूरे नहीं हुए। अलग-अलग लोगों के विचार अलग हो सकते हैं। कुछ लोग किसी एक विचार पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं और वास्तविकता को देखने की कोशिश नहीं करते। आज देश की स्थिति यही है।

आईएएनएस: सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर हो रहे प्रदर्शनों के बाद क्या आपको सत्ता परिवर्तन की उम्मीद दिखाई देती है?

सैम पित्रोदा: यह भारत के लोगों पर निर्भर करता है। मेरा व्यक्तिगत रूप से मानना है कि किसी न किसी समय अदालतों को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। न्यायपालिका में इतनी हिम्मत होनी चाहिए कि वह वास्तविकता को देख सके। न्यायपालिका लोकतंत्र की संरक्षक है। अगर उसे लगता है कि लोकतंत्र पर हमला हो रहा है या चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं हैं, तो उसे कार्रवाई करनी चाहिए। लोगों ने अपनी बात रखी है। अब अदालतों को तय करना है कि क्या सही है, क्या गलत है और देश को कैसे बचाया जाए। मेरा विश्वास कीजिए, हम एक निर्णायक मोड़ पर खड़े हैं। आधुनिक भारत के इतिहास का यह सबसे कठिन दौर है। एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और धर्म आधारित विचारधारा है। इस विचारधारा के अनुसार धर्म हमारे भविष्य का मूल आधार है। भेदभाव भी इसकी सोच का हिस्सा है। दूसरी तरफ वह रास्ता है, जिसे महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और हमारे संस्थापकों ने 1947 में चुना था। उस रास्ते का आधार धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, विविधता और समावेशिता है, लेकिन एक समूह कहता है कि ये हमारे भविष्य का मूल आधार नहीं होने चाहिए। आज हमारे सामने यही संघर्ष है। भारत के लोगों को तय करना होगा कि वे किस तरह का देश बनाना चाहते हैं। मुझे लगता है कि युवाओं ने दिखाया है कि उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कोई किस धर्म का पालन करता है। उनके लिए सभी बराबर हैं और सभी को अधिकार प्राप्त हैं। वे जाति की परवाह नहीं करते। युवाओं की यही खूबी है।

आईएएनएस: आपने कहा कि इस मामले में अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए। क्या आप इस बात पर कायम हैं?

सैम पित्रोदा: नहीं, मैंने यह नहीं कहा कि अदालतों को हस्तक्षेप करना ही चाहिए। मैंने कहा कि यह एक विकल्प है। फैसला अदालतों को करना है। मैं कौन होता हूं उन्हें निर्देश देने वाला?

आईएएनएस: विरोध प्रदर्शन के दौरान विपक्षी दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) से मिलने की मांग की थी, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मिलने से इनकार कर दिया कि वह लिखित रूप में अपना जवाब दे चुके हैं। आप इस फैसले को किस तरह देखते हैं? क्या सीजेआई को विपक्षी नेताओं से मिलना चाहिए था?

सैम पित्रोदा: नहीं, यह ठीक है। यह उनका अधिकार है। मेरे विचार से उनके नजरिए से यह सही है कि वह उन लोगों से नहीं मिलते, जो अदालत में मुकदमे दायर कर रहे हैं। ऐसा नहीं किया जाता। यह पूरी तरह ठीक है और मैं उनके फैसले का सम्मान करता हूं। मैं उनसे मिलने की इच्छा रखने वाले लोगों की भावना का भी सम्मान करता हूं। दोनों बातें ठीक हैं। लोगों ने कहा कि वे उनसे मिलना चाहते हैं और उन्होंने कहा कि अपनी बात लिखित में दीजिए या अदालत में याचिका दायर कीजिए। अब ऐसा ही किया जा रहा है। यह सामान्य प्रक्रिया है। मैं इसे किसी का अपमान नहीं मानता और न ही इसे कोई बाधा समझता हूं। यह वह प्रक्रिया है, जिसका पालन वह करना चाहते हैं। मैं उसका सम्मान करता हूं।

आईएएनएस: क्या सीजेपी को राहुल गांधी के नेतृत्व में आ जाना चाहिए?

सैम पित्रोदा: यह फैसला उन्हें खुद करना है। उन्होंने सही कहा है कि वे कोई राजनीतिक पार्टी नहीं हैं। मेरा व्यक्तिगत विचार है कि अगर वे किसी एक पार्टी के बजाय सभी के लिए निगरानी करने वाले समूह के रूप में काम करें, तो देश के लिए ज्यादा अच्छा कर सकते हैं। उन्हें कहना चाहिए कि हमारे स्कूल ठीक होने चाहिए, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत सुधरनी चाहिए और शिक्षकों का स्तर बेहतर होना चाहिए। युवाओं का यह दबाव कि अगर आप ये काम करेंगे, तो हमारा भविष्य बेहतर होगा, चाहे सत्ता में कोई भी पार्टी हो, बहुत महत्वपूर्ण है। उन्हें एक नैतिक ताकत या दबाव समूह के रूप में काम करना चाहिए, जो व्यवस्था से जरूरी काम करवाए। लोकतंत्र में ऐसे समूहों के लिए भी जगह है।

आईएएनएस: आम आदमी पार्टी लगातार कांग्रेस पर हमले कर रही है, जबकि बाकी विपक्ष एकजुट दिखाई दे रहा है। आप क्या कहना चाहेंगे?

सैम पित्रोदा: यह उनका अधिकार है। अगर उन्हें कोई बात दिखाई देती है और वे उस पर बोलना चाहते हैं, तो वे स्वतंत्र हैं। अगर वे सरकार के खिलाफ बोल रहे हैं, तो उन्हें किसी के भी खिलाफ बोलने का अधिकार है, यहां तक कि मेरे खिलाफ भी। इसमें समस्या क्या है? आपको उनसे बातचीत करनी होगी। अलग-अलग विचार होना ठीक है। आपको उन्हें अपना नजरिया समझाना चाहिए। जब तक आप आमने-सामने बैठकर बातचीत करने और मतभेद दूर करने के लिए तैयार हैं, तब तक अलग विचार होने में कोई समस्या नहीं है। आपको मुझसे सहमत होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आप मुझसे नहीं, बल्कि मेरे विचार से असहमत हैं। हमें एक बात स्पष्ट रूप से समझनी चाहिए कि हम किसी व्यक्ति पर हमला नहीं कर रहे होते, बल्कि किसी खास समय पर उसके विचार की आलोचना कर रहे होते हैं। हम सभी बदलते हैं। मैं भी बदला हूं। मैंने सीखा है और अपने विचारों में संशोधन किया है। मैंने अपने जीवन में विरोधाभासों के साथ भी जीना सीखा है। जब आप मेरे विचार की आलोचना करते हैं, तो मैं समझता हूं कि आप मेरी आलोचना नहीं कर रहे हैं। आज मेरा विचार गलत हो सकता है और कल सही हो सकता है। इसलिए किसी के विचार की आलोचना करना बिल्कुल ठीक है।

आईएएनएस: ऐसी खबरें हैं कि कॉक्रोच जनता पार्टी आम आदमी पार्टी का ही एक रूप है। इस पर आपका क्या कहना है?

सैम पित्रोदा: मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है। मैं इन चीजों के बारे में नहीं जानता। मैं उन्हें वैसा ही मानता हूं, जैसा वे खुद को बताते हैं। जहां तक मेरी समझ है, वे युवा लोगों का एक समूह हैं और काफी समझदार हैं। मैं उन्हें कभी-कभी टीवी पर देखता हूं और मुझे उन पर गर्व महसूस होता है। अपनी बात रखने की उनकी क्षमता, विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने का तरीका, इस जटिल व्यवस्था में आगे बढ़ने की क्षमता और उनका साहस अच्छा लगता है। वे अच्छे हैं। उनसे गलतियां भी हो सकती हैं और इसमें कोई समस्या नहीं है। हमें अपने युवाओं पर गर्व होना चाहिए। जब मैं उन्हें देखता हूं, तो मुझे उम्मीद दिखाई देती है। मेरी इच्छा है कि ऐसे और लोग सामने आएं, जो खुलकर बोलें और किसी उद्देश्य के लिए संघर्ष करें। उनका संघर्ष कभी-कभी गलत भी हो सकता है, लेकिन यह भी ठीक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने डर को पीछे छोड़कर साहस दिखाया। यह मेरे लिए बहुत अहम है। गांधीजी हमेशा साहस की बात करते थे। अगर आपमें साहस नहीं है, तो आप कुछ हासिल नहीं कर सकते। आपको उस बात के लिए खड़ा होना होगा, जिस पर आप विश्वास करते हैं। आपको संघर्ष करना होगा। अगर आप अपनी बात रखने और सुने जाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो कोई आपकी बात नहीं सुनेगा।

आईएएनएस: ध्रुव राठी भारत में हैं। भारत में उनका क्या प्रभाव है?

सैम पित्रोदा: मुझे लगता है कि वह एक प्रतिभाशाली युवा हैं। उनके बहुत बड़े समर्थक हैं। एक भारतीय नागरिक के रूप में उन्हें भारत में रहने और अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है। वह भी एक संघर्ष लड़ रहे हैं। यह बिल्कुल ठीक है। मैं उनके साहस का सम्मान करता हूं और उसकी सराहना करता हूं। मुझे लगता है कि हमें ऐसे और लोगों की जरूरत है। वह अच्छे हैं।

आईएएनएस: क्या अभिजीत दिपके, सौरभ दास और ध्रुव राठी जैसे लोगों को देश की बेहतरी के लिए कांग्रेस में शामिल होना चाहिए?

सैम पित्रोदा: यह फैसला उन्हें करना है और कांग्रेस को भी इस पर निर्णय लेना है। लेकिन समाज में ऐसे स्वतंत्र लोगों की जरूरत है, जो किसी मुद्दे को उठाएं और उसके लिए संघर्ष करें। जैसा कि मैंने पहले कहा, यह संघर्ष सत्ता में मौजूद पार्टी की परवाह किए बिना होना चाहिए। अगर वे कहते हैं कि मध्याह्न भोजन योजना को ठीक करना है और वे इसे ठीक करने के लिए काम करेंगे, तो यह बड़ा योगदान होगा। इसमें तीन साल भी लग सकते हैं। इससे हमारे बच्चों को भोजन में कीड़े मिलने जैसी समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है। अगर वे कहते हैं कि स्कूलों की इमारतें ठीक होनी चाहिए, सभी शौचालय साफ होने चाहिए, पानी उपलब्ध होना चाहिए, पंखे ठीक होने चाहिए और स्कूलों की रंगाई-पुताई होनी चाहिए, तो यह भी महत्वपूर्ण काम है। ये बहुत बड़े काम हैं। अगर वे शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विकास से जुड़े मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं, तो इसका देश पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।

आईएएनएस: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी पर संदीप दीक्षित की कथित टिप्पणी को लेकर विवाद हुआ था। आप क्या कहना चाहेंगे?

सैम पित्रोदा: कुछ नहीं। मैंने वह देखा नहीं है, इसलिए मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।

आईएएनएस: मनुस्मृति को लेकर आपका क्या विचार है? क्या इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए?

सैम पित्रोदा: मुझे इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। मैं इन धार्मिक विषयों पर ध्यान नहीं देता।

आईएएनएस: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे कर लिए हैं। आप उनके शासन में क्या देखना चाहेंगे?

सैम पित्रोदा: सबसे पहले, मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं। इस उम्र में हम सभी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूं। उन्होंने 25 साल पूरे किए हैं, जो अपने आप में एक उपलब्धि है। आगे क्या होगा, यह समय बताएगा।

आईएएनएस: प्रधानमंत्री मोदी के कौन से गुण आपको प्रशंसनीय लगते हैं?

सैम पित्रोदा: मैं व्यक्तियों पर टिप्पणी नहीं करता। यह मेरा काम नहीं है। किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर टिप्पणी करना बहुत व्यक्तिगत मामला है। हम सभी अलग-अलग इंसान हैं और मैं हर व्यक्ति के अस्तित्व का सम्मान करता हूं। आप मुझसे अलग हो सकते हैं और इसमें कोई समस्या नहीं है। यही विविधता है, जिसका हमें सम्मान करना चाहिए। इसलिए किसी व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं लगता।

आईएएनएस: क्या भारत रूस और यूक्रेन के बीच युद्धविराम कराने में भूमिका निभा सकता है? दोनों देशों ने भारत की मध्यस्थता की संभावना जताई है। इस पर आपकी क्या राय है?

सैम पित्रोदा: मुझे नहीं लगता कि आज भारत के पास उतनी ताकत है, जितनी होनी चाहिए। दुनिया में हमारी स्थिति वैसी नहीं है, जैसी हम मानते हैं। हम खुद को ‘विश्व गुरु’ कहते हैं। मेरे नजरिए से यह दावा निराधार है। हालांकि, अगर इससे हमारे लोगों को अच्छा महसूस होता है, तो ठीक है। लेकिन वास्तविकता अलग है। पिछले पांच वर्षों से चल रहे इस युद्ध में हमने क्या भूमिका निभाई है? यह संघर्ष काफी समय से जारी है। पांच साल बाद अचानक हम भूमिका निभाने की बात क्यों कर रहे हैं? हम पहले कहां थे? गाजा में हमने क्या भूमिका निभाई? मेरे विचार से आज हमारी विदेश नीति पहले से काफी अलग है। हम दुनिया के सबसे बड़े देश हैं और हमें वैश्विक फैसले लेने वाली मेज पर जगह मिलनी चाहिए, न कि किनारे पर बैठना चाहिए। लेकिन आज मुझे नहीं लगता कि हमें वह स्थान हासिल है। मुझे नहीं लगता कि दुनिया हमारी बातों पर उतना ध्यान दे रही है, जितना हम सोचते हैं। भारत में आम तौर पर यह धारणा बनाई जाती है कि हम विश्व गुरु हैं और पूरी दुनिया हमारी सलाह का इंतजार करती है। ऐसा नहीं है। दुनिया के अखबारों को देखिए और समझिए कि भारत को कितनी जगह मिलती है। जब तक कोई बड़ी घटना न हो, भारत को प्रमुखता से जगह नहीं मिलती। इसलिए, हमें वास्तविकता को समझना होगा। कुछ लोगों को लगता है कि विदेश नीति के मामले में हम दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण देशों में से एक हैं। मैं ऐसा नहीं मानता। रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर मेरा सवाल यही है कि पिछले पांच वर्षों में हमारी भूमिका कहां थी?

आईएएनएस: राहुल गांधी ने हाल ही में स्पेक्ट्रम के मुद्दे पर एलन मस्क का समर्थन किया। इस पर आप क्या कहेंगे?

सैम पित्रोदा: मुझे नहीं लगता कि राहुल गांधी ने उनका समर्थन किया है। राहुल गांधी यह नहीं कह रहे हैं कि एलन मस्क को स्पेक्ट्रम दिया जाना चाहिए। उनकी बात को गलत तरीके से नहीं समझना चाहिए। राहुल गांधी ने मूल रूप से मस्क के एक छोटे से संदेश पर प्रतिक्रिया दी थी। इसमें कोई समस्या नहीं है। इसका कोई बड़ा अर्थ निकालने की जरूरत नहीं है। इसका यह मतलब नहीं है कि अगर राहुल गांधी सत्ता में आएंगे, तो एलन मस्क को लाइसेंस दे देंगे। ऐसा बिल्कुल नहीं है लेकिन लोग अलग-अलग अर्थ निकाल लेते हैं।

आईएएनएस: क्या आपको लगता है कि एलन मस्क और जॉर्ज सोरोस का राजनीति और नीति निर्माण पर प्रभाव देशों को बदल रहा है?

सैम पित्रोदा: मुझे ऐसा नहीं लगता। मेरा मानना है कि उनका कुछ प्रभाव जरूर है, लेकिन वे अपना काम करते हैं, राजनेता अपना काम करते हैं और जनता अपनी भूमिका निभाती है। हर किसी की अपनी जिम्मेदारी है और सभी का योगदान होता है। वे अपनी नीतिगत प्राथमिकताओं के अनुकूल बदलाव लाने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन वे किसी देश को नहीं चलाते, जब तक कि वह दो लाख नहीं, बल्कि करीब 20 लाख आबादी वाला कोई छोटा देश न हो। ऐसी स्थिति अलग हो सकती है।

आईएएनएस: जॉर्ज सोरोस के बारे में आपकी क्या राय है?

सैम पित्रोदा: मैं उन्हें नहीं जानता। मैं उनसे कभी नहीं मिला। मैं लंबे समय से अमेरिका में रहा हूं और न्यूयॉर्क में सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान उन्हें एक-दो बार बोलते हुए देखा है। लेकिन मैंने उनसे बातचीत नहीं की और न ही उनके करीब गया। इसलिए मुझे उनके बारे में कोई विशेष जानकारी नहीं है।

आईएएनएस: क्या भारत को जॉर्ज सोरोस को यहां आने का अवसर देना चाहिए?

सैम पित्रोदा: यह भारत और सत्ता में बैठे लोगों को तय करना है। सवाल यह है कि आप किस उद्देश्य की बात कर रहे हैं? अगर जॉर्ज सोरोस किसी अच्छे काम के लिए 10 अरब डॉलर का निवेश लाना चाहते हैं, तो उस पर विचार किया जा सकता है। लेकिन यह पूरी तरह मामले और नीति पर निर्भर करेगा। अंतिम फैसला सत्ता में बैठे लोगों का अधिकार है।

आईएएनएस : देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल को देखते हुए क्या राहुल गांधी 2029 में प्रधानमंत्री बन सकते हैं?

सैम पित्रोदा : यह फैसला भारत की जनता को करना है।

आईएएनएस: आप भारत आने का कब सोच रहे हैं?

सैम पित्रोदा: पता नहीं। अब मैं पहले जितना सफर नहीं करता। देखिए, मैं 85 साल का हूं। मेरी पत्नी की भी सेहत से जुड़ी कुछ दिक्कतें हैं। इसलिए, हम सफर करने से बचते हैं। भारत में हमारा कोई नहीं है। मेरा कोई करीबी रिश्तेदार वहां नहीं है। मेरे सभी भाई-बहन और उनके बच्चे अमेरिका में हैं। हम अमेरिका में लगभग 100 लोग हैं। इसलिए रिश्तेदारों से मिलने के लिए वहां जाने की कोई जरूरत नहीं है।