चंडीगढ़, 3 नवंबर (आईएएनएस)। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की अध्यक्षता में मंगलवार को हुई हरियाणा मंत्रिपरिषद की बैठक में ‘लैंड पूलिंग पॉलिसी-2026’ को मंजूरी दी गई। यह पॉलिसी 2022 की नीति की जगह लेगी और इसका उद्देश्य विकास परियोजनाओं में जमीन मालिकों की भागीदारी को आसान बनाना है।
नई नीति के अनुसार, जमीन मालिकों को स्वीकृत लेआउट प्लान के तहत प्रोजेक्ट के कुल बिक्री योग्य क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा दिया जाएगा, जबकि बाकी हिस्सा डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन के पास रहेगा। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि जमीन मालिकों के हिस्से को बाजार मूल्य से जोड़ने वाले पुराने प्रावधानों को हटा दिया गया है।
जमीन मालिकों के 50 प्रतिशत हिस्से में तय पात्रता के अनुसार कमर्शियल (व्यावसायिक) साइटें दी जाएंगी। बाकी क्षेत्र को प्रोजेक्ट के उद्देश्य के आधार पर आवासीय, औद्योगिक या संस्थागत प्लॉट के रूप में आवंटित किया जाएगा।
यह नीति सेल डीड (बिक्री विलेख) के पंजीकरण की तारीख से चार साल तक, जमीन मालिकों को उनके द्वारा दी गई जमीन के अनुपात में 1 लाख रुपए प्रति एकड़ की वार्षिक अंतरिम वित्तीय सहायता प्रदान करती है। यदि सेल डीड के 15 दिनों के भीतर यह राशि ट्रांसफर नहीं की जाती है तो जमीन मालिक देरी की अवधि के लिए 9 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज पाने का हकदार होगा। प्रोजेक्ट पूरा करने की समय-सीमा को पांच साल से घटाकर चार साल कर दिया गया है।
डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन को प्रोजेक्ट की अंतिम मंजूरी मिलने की तारीख से चार साल के भीतर बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) सुविधाएं पूरी करनी होंगी, ऐसा न होने पर जमीन वापस जमीन मालिकों के पास चली जाएगी।
जमीन मालिकों को दिए जाने वाले विकसित प्लॉट का न्यूनतम आकार इस प्रकार तय किया गया है- आवासीय प्लॉट के लिए 100 वर्ग मीटर, औद्योगिक प्लॉट के लिए 250 वर्ग मीटर और संस्थागत प्लॉट के लिए 500 वर्ग मीटर। वास्तव में आवंटित किया जाने वाला क्षेत्र, दी गई जमीन के अनुपात में तय किया जाएगा।
जिन मामलों में जमीन का योगदान 2,000 वर्ग मीटर से अधिक है, वहां कियोस्क या बूथ के रूप में कमर्शियल प्लॉट आवंटित किए जाएंगे। 999 वर्ग मीटर से कम जमीन देने वाले जमीन मालिकों को ‘भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013’ के तहत मौद्रिक मुआवजा मिलेगा, या फिर प्लॉट की रिजर्व कीमत (जो भी अधिक हो) दी जाएगी।
‘भूमि अधिकार प्रमाण-पत्र’ रखने वाले लोग अपने प्रमाण-पत्रों को एक साथ मिलाकर बड़े विकसित प्लॉट के लिए संयुक्त रूप से आवेदन कर सकेंगे। विकास संस्था द्वारा आवंटित प्लॉट को वापस खरीदने (बायबैक) की समय-सीमा को एक साल से बढ़ाकर तीन साल कर दिया गया है।
इस नीति में ‘लैंड एग्रीगेटर’ (भूमि एकत्र करने वाले) का पारिश्रमिक भी तय किया गया है, जो उस राजस्व क्षेत्र (रेवेन्यू एस्टेट) में कृषि भूमि के लिए लागू ‘कलेक्टर रेट’ का 0.5 प्रतिशत होगा। यह पारिश्रमिक विकास एजेंसी द्वारा दिया जाएगा और इसका भुगतान परियोजना की ‘सेल डीड’ (बिक्री विलेख) प्रक्रिया पूरी होने के बाद किया जाएगा।
कैबिनेट ने ‘ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट्स’ (टीडीआर) देने और उनके उपयोग से जुड़ी नीति में भी संशोधन को मंजूरी दी है। इसका उद्देश्य टीडीआर प्रमाण-पत्रों के मूल्यांकन, हस्तांतरण और उपयोग से जुड़ी समस्याओं को दूर करना तथा पूरे राज्य में बुनियादी ढांचा विकास परियोजनाओं को लागू करने में मदद करना है।
संशोधित नीति के तहत उस काल्पनिक भूमि (नेशनल लैंड) की गणना का फॉर्मूला बदला जाएगा, जिसके लिए टीडीआर प्रमाण-पत्र जारी किया जाता है। अब यह गणना, आवेदन जमा करने की तारीख पर समर्पित (सरेंडर की गई) भूमि के लिए लागू ‘वेटेड एवरेज कलेक्टर रेट’ (भारित औसत कलेक्टर रेट) के आधार पर की जाएगी। यह मौजूदा प्रावधान की जगह लेगा, जिसके तहत गणना आवेदन वाले कैलेंडर वर्ष की 1 जनवरी को लागू दर के आधार पर की जाती थी।
