नई दिल्ली, 8 नवंबर (आईएएनएस)। हमारे देश में हर नागरिक को न्याय पाने का अधिकार है। भारतीय संविधान भी सभी को समानता और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है लेकिन क्या वास्तव में हर व्यक्ति आसानी से न्याय हासिल कर पाता है? कई बार पैसों की कमी, वकीलों की महंगी फीस और कानूनी प्रक्रियाओं की जानकारी न होने के कारण गरीब और जरूरतमंद लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठा पाते। इसी समस्या को दूर करने और हर व्यक्ति तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने के उद्देश्य से हर साल 9 नवंबर को राष्ट्रीय कानूनी सेवा दिवस मनाया जाता है। यह दिन लोगों को उनके कानूनी अधिकारों और मुफ्त कानूनी सहायता के बारे में जागरूक करने का संदेश देता है।
राष्ट्रीय कानूनी सेवा दिवस की शुरुआत के पीछे एक खास वजह है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39(ए) में यह प्रावधान किया गया है कि आर्थिक या दूसरी किसी कमजोरी के कारण कोई भी नागरिक न्याय पाने के अवसर से वंचित नहीं रहना चाहिए। इसके लिए जरूरतमंद लोगों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई।
इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए संसद ने साल 1987 में कानूनी सेवा प्राधिकरण अधिनियम पारित किया। यह कानून 9 नवंबर 1995 को लागू हुआ। इसी ऐतिहासिक दिन की याद में हर साल 9 नवंबर को राष्ट्रीय कानूनी सेवा दिवस मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कानून और न्याय केवल आर्थिक रूप से मजबूत लोगों तक सीमित न रहें बल्कि समाज के हर वर्ग को समान रूप से उपलब्ध हों।
कई लोगों को लगता है कि अदालत में अपना पक्ष रखने के लिए वकील की फीस देना जरूरी है लेकिन ऐसा नहीं है। सरकार की ओर से कुछ विशेष वर्गों को मुफ्त कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाती है। इसमें महिलाएं और बच्चे, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्य, दिव्यांग व्यक्ति, मानव तस्करी या बेगार के शिकार लोग, प्राकृतिक आपदा से प्रभावित व्यक्ति और हिरासत में मौजूद लोग शामिल हैं। इसके अलावा निर्धारित आय सीमा से कम कमाने वाले लोग भी इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। इसके तहत जरूरतमंद व्यक्ति को मुफ्त वकील, कानूनी सलाह, अदालती फीस और जरूरी दस्तावेज तैयार कराने में मदद दी जाती है।
राष्ट्रीय कानूनी सेवा दिवस के मौके पर लोक अदालतों की भूमिका को समझना भी जरूरी है। लोक अदालत विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने का एक आसान और प्रभावी माध्यम है। यहां दोनों पक्षों को साथ बैठाकर समझौते के जरिए विवाद खत्म करने की कोशिश की जाती है। इससे लोगों को लंबी अदालती प्रक्रिया और अतिरिक्त खर्च से राहत मिलती है।
मोटर दुर्घटना मुआवजे, बैंक ऋण, बिजली-पानी के बिल और वैवाहिक विवाद जैसे मामलों का निपटारा लोक अदालत में किया जा सकता है बशर्ते मामला कानूनी रूप से समझौते योग्य हो। लोक अदालत का फैसला पक्षकारों के लिए बाध्यकारी होता है और सामान्य तौर पर इसके खिलाफ अपील का प्रावधान नहीं होता।
अगर कोई व्यक्ति मुफ्त कानूनी सहायता लेना चाहता है, तो वह अपने नजदीकी जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण, तालुका कानूनी सेवा समिति या राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण से संपर्क कर सकता है। इसके अलावा राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण की हेल्पलाइन नंबर 15100 पर भी कानूनी सहायता के लिए संपर्क किया जा सकता है।
