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12 सितंबर 1948: जब पाकिस्तान ने संस्थापक जिन्ना को दी थी अंतिम विदाई, विभाजन के बाद का सबसे बड़ा मोड़

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नई दिल्ली, 11 सितंबर (आईएएनएस)। भारतीय इतिहास में 12 सितंबर 1948 का दिन उस दौर की एक महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा है, जब पाकिस्तान अपने गठन के महज एक साल बाद अपने संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को अंतिम विदाई दे रहा था। मोहम्मद अली जिन्ना का निधन 11 सितंबर 1948 को कराची में हुआ था और अगले दिन उनका राजकीय अंतिम संस्कार किया गया। उस समय पाकिस्तान के अस्तित्व में आए अभी करीब 13 महीने ही हुए थे।

मोहम्मद अली जिन्ना का राजनीतिक सफर ब्रिटिश भारत की राजनीति से शुरू हुआ था। शुरुआती दौर में वह हिंदू-मुस्लिम एकता और संवैधानिक राजनीति के समर्थक नेताओं में गिने जाते थे। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और 1916 के लखनऊ समझौते में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, हालांकि आगे चलकर कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच राजनीतिक मतभेद बढ़ते गए और जिन्ना मुस्लिम लीग के प्रमुख नेता के रूप में उभरे।

1940 के दशक में जिन्ना ने भारतीय मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक व्यवस्था और बाद में अलग राष्ट्र की मांग को मजबूती से आगे बढ़ाया। 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन के साथ भारत और पाकिस्तान दो स्वतंत्र राष्ट्रों के रूप में अस्तित्व में आए। विभाजन के साथ बड़े पैमाने पर आबादी का स्थानांतरण हुआ और व्यापक सांप्रदायिक हिंसा ने दोनों देशों के समाज और राजनीति पर गहरा असर डाला।

15 अगस्त 1947 से जिन्ना पाकिस्तान के पहले गवर्नर जनरल बने। नई सरकार के सामने प्रशासन खड़ा करने, लाखों विस्थापित लोगों के पुनर्वास और आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों जैसी बड़ी जिम्मेदारियां थीं। उनका कार्यकाल हालांकि एक साल से कुछ ही अधिक समय का रहा। सितंबर 1948 में स्वास्थ्य बिगड़ने के बाद 11 सितंबर को उनका निधन हो गया।

जिन्ना की मृत्यु ऐसे समय हुई, जब भारत और पाकिस्तान के संबंध पहले ही तनावपूर्ण हो चुके थे। विभाजन के बाद संपत्ति और संसाधनों के बंटवारे, शरणार्थी संकट और खासतौर पर जम्मू-कश्मीर का विवाद दोनों देशों के बीच शुरुआती तनाव का बड़ा कारण बना। यही मुद्दे आगे चलकर भारत-पाकिस्तान संबंधों के सबसे जटिल अध्यायों में शामिल हुए।

इस लिहाज से 12 सितंबर 1948 केवल पाकिस्तान के संस्थापक को अंतिम विदाई का दिन नहीं था, बल्कि यह उस ऐतिहासिक मोड़ की भी याद दिलाता है, जब विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान अपने-अपने नए राष्ट्र-निर्माण के रास्ते पर आगे बढ़ रहे थे।