नई दिल्ली, 9 अक्टूबर (आईएएनएस)। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हर तीन में से एक व्यक्ति को चश्मे की जरूरत है, जबकि बच्चों में नजर संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। एम्स के कम्युनिटी ऑप्थल्मोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने चेतावनी दी है कि स्क्रीन टाइम बढ़ने और जीवनशैली में बदलाव के कारण 2050 तक दुनिया की करीब आधी आबादी को चश्मे की आवश्यकता पड़ सकती है।
उन्होंने कहा कि इस चुनौती से निपटने के लिए दिल्ली में एक व्यापक कार्ययोजना तैयार की जा रही है, जिसका उद्देश्य जरूरतमंद लोगों तक समय पर नेत्र जांच और चश्मे की सुविधा पहुंचाना है। डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने दिल्ली में प्रभावी रिफ्रैक्टिव एरर कवरेज (ईआरईसी) को बेहतर बनाने के लिए रणनीतिक रोडमैप के बारे में जानकारी दी।
डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने कहा, “डब्ल्यूएचओ जिनेवा की तरफ से रिफ्लेक्टिव एरर सिचुएशन एनलिसिस टूल आया था, जिसके जरिए हमने दिल्ली में कितनी समस्या है, कितने गैप्स और क्या-क्या सॉल्यूशन है, इसे लेकर पूरी रिपोर्ट बनाई थी। इस टूल के बाद यह तय किया गया कि पूरी दिल्ली के लिए एक्शन प्लान बनाना चाहिए।”
इस टूल के हिसाब से डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने कहा कि दिल्ली में लगभग 30 फीसदी लोग तीन में से एक व्यक्ति को चश्मे की जरूरत है। चश्मा मिलने की वजह से उन्हें देखने में मदद मिल सकती है। इसमें भारत सरकार की तरफ से संयुक्त सचिव और अन्य अधिकारी मौजूद हैं और दिल्ली सरकार की तरफ से राज्य और जिला कार्यक्रम अधिकारी शामिल हैं। इसके साथ ही एम्स की पूरी टीम और पूरे देश से राज्य कार्यक्रम अधिकारी और आंखों की बीमारी पर काम करने वाले अलग-अलग एनजीओ की टीम शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम में तकरीबन 70 लोगों की टीम काम कर रही है। पूरे दिन हम यह चर्चा करेंगे कि इस समस्या के लिए हम दिल्ली में हम क्या कर सकते हैं। किस तरह से कार्यक्रम को बेहतर बनाया जा सकता है, ताकि आशा वर्कर और सभी केंद्रों को के शामिल करके हम राष्ट्रीय राजधानी में जिन्हें चश्मे की जरूरत है, उन्हें दे सकें।
उन्होंने कहा कि इसके लिए हम 2030 तक का लक्ष्य रखेंगे। इसके बाद जो एक्शन प्लान बनाया जाएगा, इसे एक-दो महीने में रिलीज करेंगे और फिर मीडिया को इसके बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। हम पिछले 25-30 साल से ये देख रहे हैं कि किस तरह से ये बढ़ रहा है।
डॉ. वशिष्ठ ने कहा कि 2001 में 7 फीसदी बच्चों को तकलीफ थी, इसके बाद 2012 में एम्स के अध्ययन में पाया गया कि 13 फीसदी बच्चों को ये दिक्कत थी। आजकल जो स्टडी की जा रही है, उसके अनुसार, 20-25 फीसदी बच्चों को परेशानी हो रही है। ये सिर्फ भारत के बच्चे नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि डब्ल्यूएचओ ने बताया है कि 2050 तक लगभग 50 फीसदी लोगों को सिर्फ मायोपिया के लिए चश्मे की जरूरत होगी। आज पढ़ाई के लिए भी बच्चे कम्प्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। इस समस्या का ये सबसे बड़ा कारण है। बच्चे पहले घर के बाहर खेलने के लिए जाया करते थे। अब वो बाहर खेलने न जाकर घर के अंदर ही मोबाइल गेम खेलते हैं।
