नई दिल्ली, 5 नवंबर (आईएएनएस)। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव चरम पर है। इस टकराव का असर अब केवल दोनों देशों के राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि व्यापारिक गतिविधियों पर भी इसका असर पड़ा है।
मध्य एशिया और दक्षिण एशिया को जोड़ने वाली व्यापारिक और परिवहन योजनाओं के सामने भी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। पाकिस्तान के रास्ते मध्य एशियाई देशों को समुद्री बंदरगाहों तक पहुंच उपलब्ध कराने की इस्लामाबाद की महत्वाकांक्षा को झटका लगा है। इसका ताजा संकेत कजाखस्तान के साथ व्यापार बढ़ाने के लक्ष्य में आई कमी से मिला है।
क्षेत्रीय मामलों पर नजर रखने वाली वेबसाइट ‘यूरेशियानेट’ ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की। जिसके अनुसार, कजाखस्तान और पाकिस्तान के बीच सालाना व्यापार एक अरब डॉलर से अधिक पहुंचने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन अब दोनों देशों ने व्यापार की संभावित क्षमता करीब 645 मिलियन डॉलर आंकी है। यह आकलन एक नवंबर को अस्ताना में कजाखस्तान के उप प्रधानमंत्री सेरिक झुमांगारिन और पाकिस्तान के निवेश मंत्री कासिम अहमद शेख के बीच हुई बातचीत के दौरान सामने आया।
पाकिस्तान मध्य एशियाई देशों के साथ अपने व्यापारिक संबंध मजबूत करने और कराची, ग्वादर तथा अन्य बंदरगाहों के जरिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है। उसकी ख्वाहिश और उम्मीदों को डेंट अफगानिस्तान ने लगाया है। अफगानिस्तान के साथ बिगड़ते रिश्ते और सीमा पार व्यापार में बाधाएं इन योजनाओं की रफ्तार में ब्रेक लगा रही हैं।
पाकिस्तान के सामने उज्बेकिस्तान के साथ व्यापार बढ़ाने का लक्ष्य भी चुनौतीपूर्ण होता दिखाई दे रहा है। दोनों देशों ने अगले पांच वर्षों में सालाना द्विपक्षीय व्यापार को दो अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े इस लक्ष्य की राह आसान नहीं बताते।
वर्ष 2024 में पाकिस्तान ने उज्बेकिस्तान को करीब 129 मिलियन डॉलर का सामान निर्यात किया था, जबकि उज्बेकिस्तान से पाकिस्तान का आयात लगभग 257 मिलियन डॉलर रहा। वर्ष 2025 के व्यापार आंकड़ों में भी खास बढ़ोतरी दर्ज नहीं हुई।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान और मध्य एशियाई देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की संभावनाओं को अफगानिस्तान के साथ जारी संघर्ष से बड़ा झटका लगा है। अफगानिस्तान भौगोलिक रूप से पाकिस्तान और मध्य एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। इसके रास्ते मध्य एशियाई देशों का सामान पाकिस्तान के बंदरगाहों तक पहुंच सकता है और वहां से समुद्री रास्तों के जरिए दूसरे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेजा जा सकता है। लेकिन दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव ने इस पूरे परिवहन नेटवर्क की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव का असर पहले से ही सीमा पार कारोबार पर दिखाई दे रहा है। दोनों देशों के बीच प्रमुख सीमा चौकियों के बंद रहने से माल की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे पाकिस्तान के उन व्यापारियों और निर्यातकों को भी नुकसान उठाना पड़ रहा है, जो अफगानिस्तान को बाजार के रूप में इस्तेमाल करने के साथ-साथ मध्य एशियाई देशों तक सामान पहुंचाने के लिए इस मार्ग पर निर्भर थे।
पाकिस्तान की ओर से अफगानिस्तान में सक्रिय तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) के खिलाफ कार्रवाई की मांग और काबुल की ओर से इन आरोपों को खारिज किए जाने के बीच दोनों देशों के संबंध लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। इस विवाद ने क्षेत्रीय संपर्क और आर्थिक सहयोग की संभावनाओं को भी प्रभावित किया है।
इसका एक संकेत अक्टूबर में मास्को फॉर्मेट के तहत हुई क्षेत्रीय बैठक में भी देखने को मिला था। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों के बीच आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर मतभेद के कारण बैठक में संयुक्त बयान जारी नहीं हो सका। इस बैठक में मध्य एशियाई देशों के अलावा भारत, चीन, ईरान और रूस समेत कई देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।
पाकिस्तान के निवेश मंत्री कासिम अहमद शेख ने अस्ताना में निवेश मंच पर अपने संबोधन में देश के बंदरगाहों को मध्य एशिया के लिए रणनीतिक प्रवेश द्वार बताया था। उनका कहना था कि पाकिस्तान के बंदरगाह क्षेत्रीय व्यापार और परिवहन संपर्क मजबूत करने के साथ सामान की आवाजाही के लिए वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध करा सकते हैं। फिलहाल जो हालात हैं, उसके मद्देनजर इन दावों को जमीन पर उतारना आसान नहीं होगा।
इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत के क्षेत्रीय हितों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से अफगानिस्तान और ईरान के रास्ते मध्य एशिया तक व्यापारिक एवं परिवहन संपर्क मजबूत करने की पैरवी करता रहा है। चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) इसी व्यापक क्षेत्रीय संपर्क रणनीति का हिस्सा हैं।
