हरिद्वार, 6 जुलाई (आईएएनएस)। उत्तराखंड में साल 2027 में प्रस्तावित कुंभ से पहले अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के नेतृत्व को लेकर मतभेद एक बार फिर चर्चा में हैं। हालांकि, संत समाज का कहना है कि यह परिषद का आंतरिक मामला है और इसका असर कुंभ मेले की तैयारियों पर नहीं पड़ेगा। इस बीच, अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी ने यह स्पष्ट किया है कि सभी अखाड़ों का साझा उद्देश्य दिव्य और भव्य कुंभ का आयोजन कराना है।
महंत रवींद्र पुरी ने सोमवार को आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि परिषद में मतभेद कोई नई बात नहीं है। 2021 में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की मृत्यु के बाद से ही परिषद दो समूहों में बंट गई थी। उस समय परिषद के महामंत्री महंत हरि गिरि थे और नियमों के अनुसार बैठक बुलाने का अधिकार उन्हीं के पास था। उसी बैठक में खाली हुए पद पर उनका चुनाव किया गया था। जिन लोगों को दूसरा गुट कहा जा रहा है, वे उनके विरोधी नहीं, बल्कि उनके भाई हैं। व्यक्तिगत स्तर पर उनके मन में किसी के प्रति दुर्भावना नहीं है।
महंत रवींद्र पुरी ने कहा कि भले ही कुछ लोग उनके खिलाफ बयान दें, आलोचना करें या उन्हें बदनाम करने की कोशिश करें, लेकिन उन्होंने कभी उनके खिलाफ कुछ नहीं कहा। माता भगवती की कृपा से वह किसी को अपना शत्रु नहीं मानते। यदि मैं किसी को अपना शत्रु मानूंगा तो उसका नुकसान नहीं, बल्कि मेरा ही नुकसान होगा। इसलिए मैं आज भी उन्हें अपना भाई मानता हूं। उन्होंने आरोप लगाया कि हाल के दिनों में कुछ मीडिया रिपोर्टों में गलत तरीके से यह प्रचारित किया गया कि जूना अखाड़ा और आवाहन अखाड़ा ने दूसरे गुट का समर्थन कर दिया है। इस तरह की खबरों के बाद उन्हें देशभर से संतों और अनुयायियों के फोन आने लगे। समाज को फर्जी खबरों से बचना चाहिए, क्योंकि थोड़े समय की चर्चा के लिए फैलाई गई गलत जानकारी भविष्य में बड़े विवादों का कारण बन सकती है।
महंत रवींद्र पुरी ने दावा किया कि उनके साथ पांच प्रमुख अखाड़ों के अलावा बड़ा उदासीन अखाड़ा के रघुमुनि समूह और निर्मल अखाड़ा के रेशम सिंह समूह का भी समर्थन है। दूसरे गुट के साथ उनके अखाड़े या उनके सहयोगी अखाड़े नहीं हैं। हालांकि, उन्होंने दोहराया कि यह समर्थन या विरोध का नहीं, बल्कि संगठनात्मक व्यवस्था का विषय है और सभी का अंतिम उद्देश्य कुंभ मेले को सफल बनाना है। मुझे कई संतों के फोन आए, जिन्होंने पूछा कि यदि कोई अलग परिषद बना सकता है, तो फिर अलग-अलग अखाड़े भी अपनी-अपनी परिषद क्यों नहीं बना सकते। उन्होंने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि ऐसी परंपरा शुरू हुई, तो भविष्य में हर अखाड़े के भीतर भी विभाजन हो सकता है। इससे संत समाज की परंपरा और संगठनात्मक व्यवस्था को नुकसान पहुंचेगा।
उन्होंने कहा कि किसी छोटे लाभ या तात्कालिक राजनीतिक-संगठनात्मक फायदे के लिए ऐसा कदम नहीं उठाया जाना चाहिए, जिससे आने वाली पीढ़ियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़े। दोनों समूह अलग-अलग काम कर रहे हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उनके बीच भाईचारा समाप्त हो गया है। कभी कोई संत एक समूह में रहता है तो कभी दूसरे समूह में चला जाता है, लेकिन इससे किसी प्रकार की स्थायी दूरी नहीं बनती।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि पहले नया अखाड़ा के संत उनके साथ थे, बाद में परिस्थितियों के अनुसार दूसरे समूह में चले गए। उन्होंने इसे सामान्य प्रक्रिया बताते हुए कहा कि ऐसे घटनाक्रमों को विवाद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। महंत ने आगे कहा कि सभी मतभेदों से ऊपर उठकर संत समाज का एकमात्र उद्देश्य उत्तराखंड में होने वाले 2027 के कुंभ को दिव्य, भव्य और सुव्यवस्थित बनाना है।

