Friday, July 24, 2026
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असम में चुनाव के पहले आदिवासियों की राजनीतिक गोलबंदी में जुटे सीएम हेमंत सोरेन, बोले- हक के लिए एकजुट हों

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रांची/विश्वनाथ (असम), 10 मार्च (आईएएनएस)। असम में विधानसभा चुनाव की आहट के बीच झारखंड के मुख्यमंत्री और झामुमो अध्यक्ष हेमंत सोरेन आदिवासियों की गोलबंदी के आधार पर राजनीति का एक नया कोण बनाने की कवायद में जुटे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने मंगलवार को असम के विश्वनाथ जिले में एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए चाय बागानों में काम करने वाले लाखों आदिवासियों की पहचान, सम्मान और उनके अधिकारों का मुद्दा जोर-शोर से उठाया।

उन्होंने दो-टूक कहा कि हजारों वर्षों से असम के विकास और चाय उद्योग में पसीना बहाने वाले आदिवासियों को अब तक उनका वाजिब हक और आदिवासी का दर्जा न मिलना एक बड़ी विडंबना है। जय भारत पार्टी, आदिवासी स्टूडेंट यूनियन ऑफ असम और अन्य संगठनों द्वारा आयोजित इस रैली में सीएम हेमंत सोरेन ने कहा कि असम के गरीब, किसान, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के लोग लंबे समय से शोषण और अत्याचार का शिकार हो रहे हैं।

इसके पहले 1 फरवरी को भी हेमंत सोरेन ने असम के तिनसुकिया जिले में आदिवासियों की एक बड़ी रैली को संबोधित किया था। मेजिकाजन चाय बागान में आयोजित इस सभा में उमड़ी भीड़ को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “आप इस देश के चाय व्यापार की रीढ़ हैं, लेकिन बदले में आपको क्या मेहनताना मिलता है, यह किसी से छिपा नहीं है। हक की इस लड़ाई में प्रदीप नाग जैसे क्रांतिकारी नेताओं ने अपनी जान तक दे दी, जिसे बेकार नहीं जाने दिया जाएगा।”

झारखंड अलग राज्य के संघर्ष का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि 50 वर्षों के लंबे संघर्ष और दिशोम गुरु शिबू सोरेन के नेतृत्व में हुए आंदोलन के बाद हमें अपना हक मिला। उन्होंने स्वर्गीय शक्ति नाथ महतो के उस संकल्प को याद किया जिसमें कहा गया था कि पहली पंक्ति के लोग शहीद होंगे, दूसरी पंक्ति के लोग जेल जाएंगे और तीसरी पंक्ति के लोग राज्य को सजाएंगे।

सीएम सोरेन ने असम के आदिवासियों से अपील की कि यदि वे अपनी स्थिति बदलना चाहते हैं तो उन्हें एक छत और एक छांव के नीचे आना होगा। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि देश में कुछ ऐसी शक्तियां सक्रिय हैं जो आदिवासी समुदाय को आर्थिक और बौद्धिक रूप से कमजोर कर उन्हें केवल ‘मजदूर’ बनाकर रखना चाहती हैं।

उन्होंने कहा, “आदिवासी समाज कभी किसी का बुरा नहीं चाहता, लेकिन अब हम अपना हक लेना जानते हैं। इसके लिए हमें कानूनी लड़ाई भी लड़नी होगी और चट्टान की तरह एकजुट रहना होगा।” झारखंड सरकार द्वारा आदिवासियों को दिए जा रहे अधिकारों का हवाला देते हुए उन्होंने असम में भी बड़े राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन की जरूरत बताई।