कोलकाता, 19 अक्टूबर (आईएएनएस)। अष्टमी और नवमी के पवित्र संधि-काल पर कोलकाता समेत पूरे पश्चिम बंगाल के दुर्गा पूजा पंडालों में संधि पूजा पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुई। इस पावन अवसर पर भक्तों ने धार्मिक मंत्रों का पाठ किया, शंखनाद किया और देवी दुर्गा के चामुंडा स्वरूप की विशेष पूजा-अर्चना की।
दुर्गा पूजा की सबसे महत्वपूर्ण रीतियों में संधि पूजा का विशेष स्थान है। यह पूजा अष्टमी और नवमी तिथि के मिलन-बिंदु पर की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह पूजा मात्र 48 मिनट तक चलती है, जिसमें अष्टमी तिथि के अंतिम 24 मिनट और नवमी तिथि के शुरुआती 24 मिनट शामिल होते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार इसी संधि-काल में देवी दुर्गा ने चामुंडा का विकराल रूप धारण कर चंड और मुंड नामक दो असुरों का वध किया था, इसलिए इस पूजा में देवी के चामुंडा रूप की ही आराधना की जाती है।
संधि पूजा के इस पावन क्षण में कोलकाता के बड़े-बड़े प्रसिद्ध पंडालों से लेकर गली-मोहल्लों की छोटी पूजा समितियों तक में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। ढाक की थाप, शंख की गूंज और सैकड़ों दीपों की जगमगाहट से पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा। पुजारियों ने पूरे विधि-विधान के साथ मां दुर्गा की आराधना की, जबकि श्रद्धालुओं ने हाथ जोड़कर सुख, समृद्धि और शक्ति का आशीर्वाद मांगा।
शाक्त परंपरा में संधि पूजा के दौरान चंडी पाठ को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। देवी माहात्म्य, जिसे दुर्गा सप्तशती के नाम से भी जाना जाता है, के पाठ के माध्यम से भक्त देवी की असीम शक्ति, उनके द्वारा राक्षसों के संहार और बुराई पर अच्छाई की विजय का स्मरण करते हैं।
इस विशेष पूजा के दौरान देवी की शक्ति और महिमा का गुणगान करने के लिए रुद्र चंडी का पाठ किया जाता है। पवित्र मंत्रों के उच्चारण, शंख ध्वनि और भक्तों के जयकारों से सभी पूजा पंडाल गूंज उठे। मान्यता है कि इस समय की गई पूजा से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। संधि पूजा के साथ ही दुर्गा पूजा अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंच जाती है और इसके बाद महानवमी की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
