चंद्रनाथ रथ की हत्या और पश्चिम बंगाल में हो रही हिंसा की हो सीबीआई जांच: सौगत रॉय

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कोलकाता, 7 मई (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणामों और उसके बाद हुई कथित राजनीतिक हिंसा को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के सांसद सौगत रॉय ने हिंसा की कड़ी निंदा की है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की हत्या पर टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने आईएएनएस से कहा कि लोकतंत्र में हिंसा और राजनीतिक हत्याओं के लिए कोई जगह नहीं है। दोषियों को जल्द से जल्द जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप लगाने से बचना चाहिए। उन्होंने इस घटना की निंदा करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की।

सांसद सौगत रॉय ने इस मामले में और कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि चंद्रनाथ रथ की हत्या की जांच अदालत की निगरानी में सीबीआई से कराई जानी चाहिए ताकि सच्चाई सामने आ सके। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में इस तरह की घटनाएं बेहद दुखद हैं और जिम्मेदार लोगों को बिना देरी के गिरफ्तार किया जाना चाहिए। टीएमसी का इस घटना से कोई संबंध नहीं है और इसे चुनाव के बाद की हिंसा का हिस्सा बताया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में राज्य में राजनीतिक हिंसा की कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनमें टीएमसी के कुछ कार्यकर्ताओं की भी हत्या हुई है। उन्होंने इन सभी घटनाओं की निंदा करते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की और कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को हिंसा से जोड़ना गलत है जब तक कि जांच पूरी न हो जाए।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर पूछे गए सवाल पर सौगत रॉय ने कहा कि उन्हें इस अभियान की पूरी जानकारी नहीं है क्योंकि संसद सदस्य होने के बावजूद रक्षा मामलों की विस्तृत जानकारी साझा नहीं की जाती। उन्होंने कहा कि सरकार इसे 88 घंटे का ऑपरेशन बताती है, लेकिन इसके वास्तविक परिणाम अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। किसी भी नुकसान पर संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।

चुनाव नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए सौगत रॉय ने कहा कि वह परिणामों को जाति या जनजाति के आधार पर विभाजित नहीं करना चाहते। सामान्य रूप से देखा जाए तो टीएमसी के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अधिक सीटें मिली हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि परिणामों को एससी, एसटी और सामान्य वर्गों के आधार पर अलग-अलग समझाना व्यावहारिक रूप से कठिन है क्योंकि यह एक व्यापक राजनीतिक जनादेश का परिणाम है।