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चुप्पी नहीं, संवेदनशील बातचीत जरूरी! आत्महत्या रोकथाम पर बदलें अपना नजरिया

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नई दिल्ली, 9 सितंबर (आईएएनएस)। कई बार इंसान बाहर से बिल्कुल सामान्य नजर आता है, लेकिन उसके भीतर क्या चल रहा है, यह किसी को पता नहीं होता। उस मुस्कुराते चेहरे के पीछे चिंता, अकेलापन, निराशा या गहरा भावनात्मक दर्द छिपा हो सकता है। ऐसे में किसी की परेशानी को नजरअंदाज करने के बजाय उसकी बात सुनना और उसे समझने की कोशिश करना बेहद जरूरी है। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस का संदेश भी यही है कि चुप्पी नहीं, बातचीत बदलाव की शुरुआत हो सकती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मानें तो हर साल दुनिया में 7.2 लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या के कारण अपनी जान गंवाते हैं। हर एक मौत सिर्फ एक व्यक्ति को नहीं खोती, बल्कि परिवार, दोस्तों, सहकर्मियों और पूरे समुदाय पर गहरा भावनात्मक और सामाजिक असर छोड़ती है। इसका आर्थिक प्रभाव भी पड़ता है। इसलिए आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत समस्या मानने के बजाय इसे एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में समझना जरूरी है।

साल 2026 में “आत्महत्या के बारे में सोच बदलना” थीम का तीसरा और अंतिम वर्ष है। इसका उद्देश्य है कि आत्महत्या को लेकर बने डर, गलत धारणाओं और सामाजिक कलंक को कम किया जाए। किसी व्यक्ति के मानसिक संघर्ष को कमजोरी समझने के बजाय संवेदनशीलता से देखा जाए और उसे मदद लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

अक्सर लोग यह सोचकर चुप रह जाते हैं कि कहीं आत्महत्या जैसे विषय पर बात करने से स्थिति और खराब न हो जाए। लेकिन जरूरत इस बात की है कि ऐसे विषयों पर बिना जज किए, शांत और संवेदनशील तरीके से बातचीत की जाए। अगर कोई व्यक्ति लगातार निराश दिखाई दे, खुद को लोगों से अलग करने लगे, व्यवहार में अचानक बदलाव आए या जीवन को लेकर बहुत नकारात्मक बातें करे, तो उसकी बात को गंभीरता से लेना चाहिए। हर संकेत का मतलब एक जैसा नहीं होता, लेकिन परेशान व्यक्ति तक पहुंचने और उसकी बात सुनने में देर नहीं करनी चाहिए।

यह भी समझना जरूरी है कि आत्महत्या के पीछे केवल मानसिक बीमारी ही जिम्मेदार नहीं होती। कई बार व्यक्तिगत संकट, सामाजिक परिस्थितियां, आर्थिक परेशानी, रिश्तों में तनाव, अकेलापन और दूसरी परिस्थितियां भी किसी व्यक्ति की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए समाधान भी सिर्फ एक स्तर पर नहीं, बल्कि परिवार, समाज, स्वास्थ्य व्यवस्था और सरकार- सभी की साझा जिम्मेदारी से संभव है।

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस की शुरुआत वर्ष 2003 में आत्महत्या रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के साथ मिलकर की थी। हर साल 10 सितंबर को दुनिया भर में इस दिन के जरिए आत्महत्या की रोकथाम के लिए जागरूकता बढ़ाई जाती है और यह संदेश दिया जाता है कि आत्महत्याओं को रोकने के लिए मिलकर प्रयास किए जा सकते हैं।