Sunday, August 9, 2026
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मथुरा कारसेवा के आह्वान पर मौलाना साजिद रशीदी बोले-‘1992 जैसा काला दिन दोहराने की साजिश, सरकार करे कार्रवाई’

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नई दिल्ली, 9 अगस्त (आईएएनएस)। ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर, ज्ञानवापी-मथुरा विवाद, केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के ‘वंदे मातरम’ वाले बयान और कांवरियों पर कथित टिप्पणियों को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ कार्रवाई सांप्रदायिक सोच के कारण की जा रही है।

मौलाना साजिद रशीदी ने अपने खिलाफ एफआईआर पर आईएएनएस से बात करते हुए कहा, “मेरे खिलाफ एफआईआर इसलिए दर्ज की गईं क्योंकि मैं एक मुसलमान हूं और मैंने लोगों के सामने एक सच्ची और अच्छी बात रखने की कोशिश की। केशव प्रसाद मौर्य का बयान कि सारे मदरसे आतंकवाद की फैक्ट्री हैं, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।”

उन्होंने 6 दिसंबर को मथुरा में कारसेवा करने के संतों के ऐलान को भी गलत बताया और कहा, “आपको याद होगा कि यह वही कारसेवा है जिसके कारण 1992 में बाबरी मस्जिद को गिराया गया था। वह पूरे देश के लिए एक काला दिन था। एक ढांचे को गैर-कानूनी तरीके से गिराया गया था और सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद को गिराने का काम गैर-कानूनी तरीके से किया गया था।”

उन्होंने कहा, “कोर्ट ने यह भी कहा कि इस कार्रवाई में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। वो अलग बात है कि छोटी अदालतों ने उन्हें माफ कर दिया। ऐसा आह्वान करने वाले संत तो नहीं हो सकते। वे संत का चोला पहनकर हिंदू-मुस्लिम में नफरत पैदा करना चाहते हैं। वे आसिफ मुनीर के पैटर्न पर काम कर रहे हैं कि हिंदू मुसलमान एकसाथ काम नहीं कर सकते। शासन-प्रशासन को उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।”

केरल के पूर्व मुख्यमंत्री और सीपीआई(एम) नेता पिनाराई विजयन के ‘वंदे मातरम’ पर दिए गए बयान पर मौलाना रशीदी ने कहा, “वंदे मातरम किसी भी तरह से अनिवार्य नहीं है। न तो यह संविधान के तहत अनिवार्य है और न ही संसद द्वारा हाल ही में पारित बिल में इसे गाने के बारे में कुछ कहा गया है। यह बिल केवल इसके अपमान को रोकने के बारे में है। इसलिए, मेरी नज़र में, बार-बार जानबूझकर वंदे मातरम का मुद्दा उठाना और मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना एक गंदी राजनीतिक चाल है।”

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा, “मेरा मानना है कि 1986 और 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि यह किसी पर थोपा नहीं जा सकता और जबरदस्ती नहीं की जा सकती। ऐसा आदेश पारित क्यों करते हैं कि यह सभी को गाना पड़ेगा और पूरा गाना पड़ेगा। यह मुसलमानों के आस्था के खिलाफ है। यह अच्छी राजनीति नहीं है। बेरोजगारी, शिक्षा और रोजगार पर बात करनी चाहिए। हिंदू-मुसलमान में नफरत पैदा ठीक नहीं।”