चंडीगढ़, 7 नवंबर (आईएएनएस)। दिवाली पर पटाखों से होने वाली चोटों को लेकर पीजीआई चंडीगढ़ और एम्स दिल्ली ने विशेष आपातकालीन व्यवस्थाएं की हैं। पीजीआई में हर साल 70 से 75 और एम्स में करीब 100 पटाखा चोट के मामले आते हैं, जिनमें जलने और गंभीर बर्न इंजरी के केस शामिल होते हैं। दोनों अस्पतालों में विशेष डॉक्टरों की टीम, आरक्षित बेड और इमरजेंसी ओटी तैयार रखे गए हैं। साथ ही डॉक्टरों ने पटाखे जलाते समय सुरक्षित दूरी, बच्चों पर निगरानी और जलने पर घरेलू नुस्खों से बचने की सलाह दी है।
पीजीआई चंडीगढ़ ने दिवाली से पहले पटाखों से होने वाली चोटों के इलाज के लिए विशेष आपातकालीन व्यवस्थाएं की हैं। एडवांस आई सेंटर पीजीआई की विभागाध्यक्ष डॉ. उषा सिंह ने कहा, “हम दिवाली की तैयारियां कर रहे हैं। दिवाली खुशियों का त्योहार है, जिसमें हम दीये जलाते हैं, लेकिन कई लोग पटाखे भी फोड़ते हैं। दुर्भाग्य से, पटाखों से हर साल कई चोटें लगती हैं। हर साल करीब 70 से 75 मामले सामने आते हैं। इनमें से कई चोटें आंखों से जुड़ी होती हैं। कुछ सतही होती हैं, जबकि कुछ में रासायनिक जलन, थर्मल बर्न और पटाखों के फटने से आंखों के फटने जैसी गंभीर चोटें भी शामिल होती हैं।”
उन्होंने कहा कि पिछले साल जिन लोगों की आंखें फटी थीं, ऐसे मरीज करीब 40 फीसदी थे। उन 40 फीसदी मरीजों को तुरंत ऑपरेशन की जरूरत पड़ी थी। इसलिए हमारी पूरी टीम, जिसमें लगभग 20 डॉक्टर शामिल हैं, दिवाली के दिन तैनात रहती है। दिवाली और उसके बाद के तीन दिनों को मिलाकर लगभग 55 डॉक्टरों की टीम पूरी तरह तैयार रहती है।
डॉ. उषा ने कहा कि ऐसे मरीजों का जितना भी इलाज होता है, वह नि:शुल्क किया जाता है। पीजीआई दवाइयां उपलब्ध कराता है और हमारे पास ऐसे मरीजों के लिए विशेष और आरक्षित बेड भी हैं। हमने नियमित मरीजों के ऑपरेशन कम करके आपातकालीन सर्जरी के लिए ओटी में तीन टेबल तैयार रखी हैं।
उन्होंने कहा कि कोई भी मरीज आता है तो उसकी सर्जरी तुरंत कर दी जाती है। एक विशेष एनेस्थीसिया टीम भी उपलब्ध रहती है, जो मरीज को बेहोशी देने और जल्दी ऑपरेशन कराने में मदद करती है। हमारे पास चंडीगढ़, हरियाणा, पंजाब और हिमाचल प्रदेश से मरीज आते हैं। ज्यादातर चोटें आंखों में होती हैं। इनमें जलन, बर्न्स, आंख का गोला (आईबॉल) फटना या उसके अंदर कचरा चले जाना जैसी समस्याएं शामिल होती हैं। ऐसे मामलों को हम ओपन ग्लोब इंजरी कहते हैं।
इन चोटों का मुख्य कारण के बारे में डॉ. उषा ने कहा कि ज्यादातर चोटें पटाखों की वजह से ही होती हैं। जब पटाखे फटते हैं, तो उनका विस्फोट बहुत तेज होता है। कई बार उनके टुकड़े आंख के अंदर चले जाते हैं। कई बार चोट लगने से आंख की रक्त वाहिकाएं फट जाती हैं और अंदर खून जम जाता है। इसी तरह के लगभग 70 से 75 केस हर साल आते हैं।
उन्होंने कहा कि मैं सभी से कहना चाहूंगी कि दिवाली के दौरान कुछ सावधानियां जरूर बरतें। पटाखे हमेशा सुरक्षित दूरी से जलाएं, खुली जगह या मैदान में पटाखे चलाएं, गाड़ियों और सूखे पत्तों से दूर रहें, बच्चों पर पूरी निगरानी रखें, बच्चों को कभी भी जलती हुई माचिस या पटाखा हाथ में न दें, कॉटन के कपड़े पहनें, पटाखों को बुझाने और फेंकने के लिए पानी की बाल्टी या रेत की व्यवस्था रखें।
उन्होंने कहा कि पटाखे जलाने के बाद उन्हें सुरक्षित रूप से पानी या रेत में डालें, अनार को हाथ में पकड़कर न जलाएं और बोतल या टिन के डिब्बे में रॉकेट रखकर न जलाएं। ऐसा करने से पटाखा फट सकता है और उसके छोटे-छोटे टुकड़े आंखों में जाकर गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
इसके अलावा, एम्स दिल्ली के प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव और बर्न्स सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष सिंघल कहते हैं, ”हमें हर साल पटाखों से चोट लगने के करीब 100 मामले मिलते हैं और इस साल यह संख्या बढ़ सकती है। ज्यादातर हादसे लापरवाही के कारण होते हैं। छोटे बच्चों को पटाखे न दें। एक बार में केवल एक पटाखा जलाएं और कभी आधे जले हुए पटाखों को दोबारा न जलाएं। अच्छी गुणवत्ता वाले, ब्रांडेड पटाखों का ही इस्तेमाल करें। जलने की स्थिति में प्रभावित हिस्से पर साफ, गीला कपड़ा रखकर घाव को ठंडा करें और तुरंत अस्पताल जाएं। घरेलू नुस्खों या केमिकल लगाने से बचें।”
