नई दिल्ली, 1 जून (आईएएनएस)। आर्चरी (तीरंदाजी) को शुरुआत में पुरुषों का खेल माना जाता था। इस गेम में महिलाओं की भागीदारी न के बराबर थी। हालांकि, महिलाओं के बीच इस खेल को भारत की स्टार खिलाड़ी डोला बनर्जी ने मशहूर किया। वह भारत की ओर से ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली महिला आर्चरी खिलाड़ी रहीं।
डोला बनर्जी का जन्म 2 जून, 1980 को पश्चिम बंगाल के बारानगर में हुआ। डोला को शुरुआत से ही आर्चरी के खेल में खास रुचि थी। यही वजह रही कि उन्होंने महज 8 साल की उम्र से ही निशाना लगाना शुरू कर दिया। इस खेल के प्रति लगाव और उनकी जिद को देखते हुए डोला के माता-पिता ने उनका दाखिला बारानगर तीरंदाजी क्लब में करा दिया। यहां डोला ने आर्चरी की बारीकियों को सीखा और धीरे-धीरे इस खेल में निपुण हो गईं।
इंटरनेशनल स्टेज पर डोला को पहली बार अपनी काबिलियत दिखाने का मौका 1996 में मिला। सैन डिएगो में हुई युवा विश्व चैंपियनशिप में डोला ने महज 16 साल की उम्र में हिस्सा लिया और शानदार प्रदर्शन करके दिखाया।
डोला बनर्जी को असल मायनों में पहचान साल 2004 में मिली, जब वह एथेंस ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय आर्चरी खिलाड़ी बनीं। हालांकि, ओलंपिक में उनका प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा और वह व्यक्तिगत स्पर्धा में 13वें स्थान पर रहीं।
डोला के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि साल 2007 में आई। उन्होंने दुबई के मेदिनात एम्फीथिएटर में आयोजित हुए आर्चरी विश्व कप के फाइनल मुकाबले में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया। डोला के इस गोल्ड मेडल ने महिलाओं को आर्चरी के खेल को करियर के रूप में चुनने के लिए प्रेरित किया।
डोला साल 2008 में हुए बीजिंग ओलंपिक में हिस्सा लेने वाली भारतीय टीम का हिस्सा भी रहीं। वहीं, 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स में डोला का प्रदर्शन कमाल का रहा और उन्होंने महिला रिकर्व टीम इवेंट में दीपिका कुमारी और बॉम्बैला देवी संग मिलकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया।
भारत ने फाइनल में इंग्लैंड को शिकस्त दी थी। डोला को आर्चरी के खेल में अहम योगदान के लिए साल 2005 में सरकार ने ‘अर्जुन पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया।

