हजारी प्रसाद द्विवेदी पुण्यतिथि विशेष: हिंदी साहित्य को समृद्ध करने वाले विचारक और आलोचक थे द्विवेदी

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नई दिल्ली, 18 मई (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति के क्षेत्र में आज भी जब किसी महान साहित्यकार की चर्चा होती है तो हजारी प्रसाद द्विवेदी का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। 19 मई 1979 को इस संसार से विदा हुए द्विवेदी अपनी रचनाओं के जरिए हर पीढ़ी के बीच अमर रहे।

वह केवल एक साहित्यकार ही नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य को नई दिशा देने वाले आचार्य, विचारक और आलोचक थे। उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक छोटे से गांव में जन्मे हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी मेधा और परिश्रम से पूरे हिंदी जगत को प्रभावित किया। उन्होंने परंपरा और आधुनिकता के बीच सुंदर सेतु का निर्माण किया। उनका मानना था कि भारतीय संस्कृति स्थिर नहीं है, बल्कि वह निरंतर विकासशील है। इसी सोच के साथ उन्होंने हिंदी गद्य को नया रूप दिया और उसे समृद्ध बनाया।

द्विवेदी की प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत महाविद्यालय, काशी से हुई। 1929 में उन्होंने संस्कृत साहित्य में शास्त्री और 1930 में ज्योतिष विषय से शास्त्राचार्य की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उनका जीवन एक नया मोड़ लेते हुए शांति निकेतन पहुंचा। 8 नवंबर 1930 से उन्होंने शांति निकेतन में हिंदी शिक्षक के रूप में कार्य शुरू किया। लगभग दो दशक तक वे वहां रहे और हिंदी भवन के निदेशक भी रहे। इस दौरान उन्हें गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और आचार्य क्षितिमोहन सेन का सान्निध्य मिला, जिसने उनके व्यक्तित्व और चिंतन को गहराई प्रदान की। गुरुदेव टैगोर के शिष्य के रूप में हजारी प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी साहित्य को बंगाल की साहित्यिक चेतना से भी जोड़ा।

1950 में हजारी प्रसाद वाराणसी लौटे और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। इसके बाद पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में भी हिंदी विभाग का उन्होंने नेतृत्व किया। साल 1967 में वे बीएचयू के रेक्टर भी रहे। उन्होंने राजभाषा आयोग के सदस्य के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्यिक योगदान की बात करें तो वह बहुमुखी था। उन्होंने उपन्यास से लेकर निबंध, आलोचना और साहित्य इतिहास के लगभग सभी क्षेत्रों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनके प्रमुख उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारु चन्द्रलेखा’, ‘अनामदास का पोथा’ और ‘पुनर्नवा’ आज भी हिंदी साहित्य के क्लासिक माने जाते हैं। वही, निबंध साहित्य में ‘अशोक के फूल’, ‘कुटज’, ‘आलोक पर्व’ और ‘कल्पलता’ जैसे संग्रह बेहद लोकप्रिय हुए। उनकी आलोचनात्मक कृतियां जैसे ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’, ‘नाथ सम्प्रदाय’, ‘कबीर’ और ‘सूर-साहित्य’ उनकी गहन विद्वत्ता को दर्शाती हैं। उनकी भाषा सरल, सहज, व्यंग्यात्मक और प्रभावशाली थी। उन्होंने हिंदी गद्य को नया आयाम दिया।

उनके योगदान को कई सम्मानों से नवाजा गया। 1957 में उन्हें पद्मभूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार और टैगोर पुरस्कार मिला। लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि दी।