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हरिद्वार से देवप्रयाग तक… पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए खास हैं उत्तराखंड के ये तीर्थस्थल

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हरिद्वार, 27 सितंबर (आईएएनएस)। पितृ पक्ष में लोग अपने पूर्वजों को याद करते हुए उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। हिंदू धर्म में पितरों के निमित्त किए जाने वाले इन कर्मकांडों का विशेष महत्व बताया गया है। देश में गया, काशी, प्रयागराज और पुष्कर जैसे कई तीर्थ श्राद्ध और पिंडदान के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन उत्तराखंड में भी कई ऐसे पवित्र स्थान हैं, जहां पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है। यहां गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे कई तीर्थों का धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इन पवित्र स्थानों पर श्रद्धा के साथ पितरों का स्मरण, तर्पण और पिंडदान करने से पूर्वजों को शांति मिलती है।

हरिद्वार में स्थित नारायणी शिला पितरों के श्राद्ध और तर्पण के लिए प्रमुख तीर्थ मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस स्थान का संबंध भगवान विष्णु से माना जाता है। पितृ पक्ष के दौरान यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अपने पूर्वजों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान कराने पहुंचते हैं। यहां तीर्थ पुरोहितों की मदद से श्राद्ध और तर्पण कराया जाता है।

हरिद्वार में ही कुशावर्त घाट पितृ कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह घाट हरिद्वार के प्राचीन धार्मिक स्थलों में गिना जाता है और इसकी अपनी पौराणिक मान्यताएं हैं। धार्मिक परंपरा में इसे भगवान दत्तात्रेय से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि यहीं पर उन्होंने अपनी घोर तपस्या की थी। मान्यता है कि पांडवों और भगवान राम ने भी अपने पितरों के लिए यहां श्राद्ध और तर्पण किया था। यही वजह है कि पितृ पक्ष के दौरान श्रद्धालु यहां गंगा स्नान के साथ पितरों के निमित्त तर्पण करते हैं।

उत्तराखंड में पितृ कर्म के सबसे प्रसिद्ध स्थानों में बदरीनाथ धाम का ब्रह्मकपाल भी शामिल है। अलकनंदा नदी के किनारे स्थित ब्रह्मकपाल को पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए बेहद महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है।

धार्मिक मान्यता है कि महादेव को ब्रह्म हत्या के पाप से यहीं पर मुक्ति मिली थी। ब्रह्मकपाल के बारे में यह भी मान्यता प्रचलित है कि यहां विधि-विधान से पितृ कर्म करने के बाद पितरों के लिए दोबारा पिंडदान की आवश्यकता नहीं रहती। यही वजह है कि पितृ पक्ष के दिनों में ब्रह्मकपाल का महत्व और भी बढ़ जाता है।

अब बात करते हैं देवप्रयाग की। यह उत्तराखंड का वह प्रसिद्ध तीर्थ है, जहां अलकनंदा और भागीरथी नदियों का संगम होता है और इसके बाद नदी को गंगा के नाम से जाना जाता है। संगम होने के कारण देवप्रयाग का धार्मिक महत्व बहुत अधिक माना जाता है। यहां श्रद्धालु पूजा-पाठ के साथ अपने पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध भी करते हैं।

देवप्रयाग से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं भी प्रचलित हैं। मान्यता है कि यहां पितरों का स्मरण और तर्पण करने से उन्हें शांति प्राप्त होती है। पितृ पक्ष के दौरान इस तीर्थ पर भी श्रद्धालु अपने पूर्वजों के लिए कर्मकांड कराने पहुंचते हैं।

उत्तराखंड के चारधामों में शामिल गंगोत्री धाम भी पितृ कर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां भागीरथी नदी के तट पर स्थित भागीरथ शिला से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हैं। राजा भगीरथ द्वारा गंगा को पृथ्वी पर लाने की कथा हिंदू धार्मिक परंपरा में बेहद प्रसिद्ध है। माना जाता है कि गंगा के धरती पर आने का उद्देश्य ही पूर्वजों का उद्धार था। इसी वजह से गंगोत्री में गंगा के तट पर पितरों के लिए तर्पण करने की परंपरा को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है।

उत्तराखंड में केवल हरिद्वार, बदरीनाथ और देवप्रयाग ही नहीं, बल्कि कई अन्य तीर्थों से भी पितृ कर्म की परंपराएं जुड़ी हैं। त्रियुगीनारायण और आसपास के तीर्थों में विभिन्न कुंडों और नदियों से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं हैं। इसी तरह पंचकेदार क्षेत्र के कुछ स्थानों पर भी स्थानीय धार्मिक परंपराओं के अनुसार, पितरों का तर्पण किया जाता है।