Friday, June 19, 2026
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हिमाचल गौरव सोमदत्त बट्टू ने लोकसंगीत की समृद्ध परंपरा को दुनिया तक पहुंचाया

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नई दिल्ली, 10 अप्रैल (आईएएनएस)। 11 अप्रैल सिर्फ तारीख नहीं बल्कि हिमाचल की मिट्टी से निकले एक ऐसे सुर साधक का जन्मदिन है, जिन्होंने लोकसंगीत को घर-घर ही नहीं बल्कि देश-विदेश तक पहचान दिलाई। हम बात कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के जसूर गांव में जन्मे प्रसिद्ध संगीतज्ञ सोमदत्त बट्टू की, जिन्हें लोग आज हिमाचल गौरव के रूप में भी जानते हैं।

सोमदत्त बट्टू का जन्म 11 अप्रैल 1938 को हुआ था। बचपन से ही उनके घर का माहौल संगीत से भरा हुआ था। उनके पिता खुद एक गायक थे। ऐसे माहौल में बड़े होते हुए सोमदत्त बट्टू ने बहुत छोटी उम्र में ही लोकसंगीत की बारीकियों को समझना और महसूस करना शुरू कर दिया था। गांव की चौपालों से लेकर धार्मिक आयोजनों तक जहां भी लोकधुनें गूंजती थीं, वहीं से उनके भीतर संगीत की नींव मजबूत होती चली गई।

धीरे-धीरे उन्होंने शास्त्रीय संगीत की ओर भी कदम बढ़ाया। उन्होंने ग्वालियर घराने के श्रीकुंज लाल शर्मा और पटियाला घराने के कुंदनलाल शर्मा से विधिवत संगीत की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद इंदौर घराने के महान उस्ताद अमीर खान के सानिध्य में रहकर उन्होंने अपनी गायकी को और भी परिष्कृत किया। इन तीनों परंपराओं का संगम ही आगे चलकर उनकी संगीत शैली की सबसे बड़ी ताकत बना।

सोमदत्त बट्टू की खासियत यह रही कि उन्होंने कभी लोकसंगीत को शास्त्रीय संगीत से अलग नहीं माना बल्कि दोनों को एक-दूसरे का पूरक समझा। यही वजह है कि उनकी प्रस्तुतियों में एक तरफ शास्त्रीय रागों की गंभीरता होती थी, तो दूसरी तरफ हिमाचली लोकधुनों की सरलता और अपनापन भी साफ झलकता था। उन्होंने हिमाचल प्रदेश की कई लोकसंगीत शैलियों को संजोने, संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया।

वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के शीर्ष श्रेणी के कलाकार रहे हैं। उनके कार्यक्रमों को देशभर में सुना और सराहा गया। उन्होंने हिमाचल की लोकधुनों पर आधारित कई कार्यक्रम तैयार किए, जिन्होंने लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम किया। देश ही नहीं विदेशों में भी उन्होंने कई प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में हिमाचल का प्रतिनिधित्व किया और भारतीय लोकसंगीत की छवि को मजबूत किया।

सिर्फ गायक ही नहीं सोमदत्त बट्टू एक अच्छे लेखक और शोधकर्ता भी रहे हैं। उन्होंने लोकसंगीत पर गहन अध्ययन किया और उसकी परंपराओं को लिखित रूप में भी संजोया। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। उन्हें 2018 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा 1975 में संगीत कला रत्न, 2001 में डॉ. यशवंत सिंह परमार पुरस्कार, 2012 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, 2014 में संगीत मार्तंड पुरस्कार और कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान भी उनके नाम हैं। सबसे बड़ा सम्मान उन्हें 2024 में पद्मश्री के रूप में मिला जिसने उनके जीवनभर की संगीत साधना को राष्ट्रीय पहचान दी।