SGSU Advertisement
Home राजनीति हिमालय के लिए अलग विकास मॉडल जरूरी, आपदा से सबक ले सरकार:...

हिमालय के लिए अलग विकास मॉडल जरूरी, आपदा से सबक ले सरकार: प्रदीप टम्टा

0
3

देहरादून, 21 सितंबर (आईएएनएस)। कांग्रेस के पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा ने हिमालयी क्षेत्रों के विकास मॉडल, यूपीआई शुल्क और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के राजनीतिक संन्यास की चर्चाओं पर अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने केंद्र सरकार पर हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हुए कहा कि हिमालय के लिए अलग और टिकाऊ विकास दृष्टिकोण की आवश्यकता है। हिमालय को बचाना केवल उत्तराखंड को बचाने तक सीमित विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध देश के मैदानी राज्यों और व्यापक पर्यावरणीय संतुलन से है।

प्रदीप टम्टा ने कहा कि उत्तराखंड भारत की करीब ढाई से तीन हजार किलोमीटर लंबी हिमालयी श्रृंखला के मध्य हिस्से में स्थित है। उन्होंने इसे सेंट्रल हिमालय का महत्वपूर्ण क्षेत्र बताते हुए कहा कि इसकी भौगोलिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को देखते हुए यहां सामान्य विकास मॉडल लागू नहीं किया जा सकता। 2013 की केदारनाथ आपदा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उस त्रासदी के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समय हिमालय के लिए एक समिति गठित की गई थी। टम्टा ने बताया कि बीके चतुर्वेदी की अध्यक्षता वाली समिति ने उत्तराखंड सहित पूरे हिमालयी राज्यों के लिए नए विकास दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर दिया था। हिमालयी राज्यों और केंद्र सरकार को मिलकर ऐसा मॉडल तैयार करना चाहिए, जिससे विकास के साथ हिमालय की पारिस्थितिकी भी सुरक्षित रह सके।

प्रदीप टम्टा ने हाल की नेपाल की त्रासदी का जिक्र करते हुए कहा कि हिमालय कई राज्यों और देशों में फैला हुआ एक साझा भौगोलिक क्षेत्र है। इस भूगोल को अलग-अलग राजनीतिक सीमाओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता। भूस्खलन, हिमस्खलन या ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड जैसी घटनाएं हिमालय के एक हिस्से में होती हैं तो उनका प्रभाव दूसरे हिस्सों पर भी पड़ सकता है। किसी विशेष घटना के कारणों की वैज्ञानिक जांच जरूरी है, लेकिन हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली आपदाएं पूरे क्षेत्र के लिए चेतावनी हैं। उन्होंने पूर्व में चमोली में आई आपदा का भी उल्लेख किया और कहा कि ऐसी घटनाओं के बाद विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय पर्यावरणीय संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

कांग्रेस नेता ने हिमालयी क्षेत्रों में बनाई जा रही चौड़ी सड़कों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि कई स्थानों पर ऐसी सड़कों का निर्माण किया जा रहा है जिनकी वास्तविक आवश्यकता और पर्यावरणीय प्रभाव पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। धाराली की पिछली घटना का उल्लेख करते हुए टम्टा ने दावा किया कि परिवहन मंत्रालय द्वारा गठित विशेषज्ञ समिति ने भी कुछ स्थानों पर इतनी चौड़ी सड़क की आवश्यकता पर सवाल उठाए थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार अपनी ही विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को गंभीरता से नहीं ले रही है। हिमालयी क्षेत्र में किसी भी परियोजना को मंजूरी देने से पहले उसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव का आकलन होना चाहिए। विकास की गति के साथ यह देखना भी जरूरी है कि उससे पहाड़ों की प्राकृतिक संरचना पर कितना दबाव पड़ रहा है।

प्रदीप टम्टा ने केंद्र सरकार पर हिमालय के प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन का आरोप लगाते हुए कहा कि हिमालय में जल और जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधन केवल उत्तराखंड के लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि पूरे उत्तर भारत की जीवनरेखा हैं। हिमालय को नुकसान होने का प्रभाव पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे मैदानी राज्यों तक पहुंच सकता है। हिमालय की नदियां, जंगल और पर्यावरणीय तंत्र पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि हिमालय को सुरक्षित रखना है तो केंद्र सरकार को विकास की मौजूदा सोच में बदलाव करना होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इस दिशा में केंद्र सरकार अपेक्षित रूप से सफल नहीं रही है।

यूपीआई शुल्क को लेकर भी प्रदीप टम्टा ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने इसे कॉरपोरेट और राजनीतिक हितों के गठजोड़ से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि पहले डिजिटल भुगतान को मुफ्त या बेहद आसान बनाकर लोगों को इसकी आदत डाली गई और बाद में शुल्क की चर्चा शुरू हुई। उन्होंने कहा कि यूपीआई की लोकप्रियता का एक प्रमुख कारण यह रहा कि लोगों को डिजिटल भुगतान की सुविधा बिना अतिरिक्त शुल्क के मिली। अंतरराष्ट्रीय भुगतान कंपनियों के दबाव में यूपीआई पर शुल्क लगाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। उन्होंने चिंता जताई कि यदि भविष्य में यूपीआई लेन-देन पर शुल्क बढ़ाया जाता है तो इसका सबसे ज्यादा असर आम और गरीब उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के राजनीतिक संन्यास को लेकर चल रही चर्चाओं पर प्रदीप टम्टा ने कहा कि वह हरीश रावत को लंबे समय से जानते हैं और उन्हें एक योद्धा मानते हैं। उन्होंने कहा कि जब देश, लोकतंत्र और कांग्रेस को संघर्ष की जरूरत है, तब हरीश रावत जैसे नेताओं को आगे रहकर लड़ना चाहिए। वह नहीं मानते कि इस समय हरीश रावत के राजनीतिक संन्यास की कोई जरूरत है। संन्यास का फैसला व्यक्ति के हाथ में नहीं बल्कि ईश्वर के हाथ में है। हरीश रावत केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि उत्तराखंड में लाखों कांग्रेस कार्यकर्ताओं की उम्मीदों का केंद्र हैं।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता नहीं चाहेंगे कि हरीश रावत सक्रिय राजनीति से दूर जाएं। टम्टा ने संकेत दिया कि पार्टी के भीतर भी उनकी सक्रिय भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है और कार्यकर्ता चाहते हैं कि वह आगे भी राजनीतिक संघर्ष में शामिल रहें।