Thursday, June 11, 2026
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केरल चुनाव से पहले भाजपा को बढ़ते विरोध का करना पड़ रहा सामना

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तिरुवनंतपुरम, 18 मार्च (आईएएनएस)। 9 अप्रैल को होने वाले केरल विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की सियासत में हलचल तेज हो गई है। भाजपा की पहली उम्मीदवार सूची जारी होते ही पार्टी के अंदर असंतोष खुलकर सामने आ गया है। यही स्थिति कांग्रेस और सीपीआई(एम) में भी देखने को मिल रही है, जहां चुनावी अभियान शुरू होने से पहले ही अंदरूनी खींचतान बढ़ गई है।

भाजपा के लिए यह स्थिति ज्यादा गंभीर मानी जा रही है क्योंकि राज्य की 140 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल उसका एक भी विधायक नहीं है। 2016 में ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी ने तिरुवनंतपुरम जिले की नेमोम सीट जीती थी, लेकिन बाद में वह सीट भी हाथ से निकल गई।

ऐसे में पार्टी के लिए यह चुनाव अपनी जमीन मजबूत करने का अहम मौका है, लेकिन मौजूदा विवाद इस कोशिश को कमजोर कर सकता है।

उम्मीदवार सूची में वरिष्ठ नेताओं जैसे कुम्मनम राजशेखरन और पीएस श्रीधरन पिल्लई (दोनों पूर्व राज्यपाल और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष) को शामिल नहीं किए जाने से पार्टी के भीतर नाराजगी बढ़ गई है। जमीनी स्तर के कार्यकर्ता इसे अनुभवी नेताओं की अनदेखी मानते हुए विरोध जता रहे हैं। कई जिलों में यह असंतोष सड़कों तक भी पहुंच गया है।

सबसे बड़ा विवाद चेंगन्नूर से जिला अध्यक्ष संदीप वाचस्पति को हटाकर हरिपाड भेजने के फैसले को लेकर है। स्थानीय कार्यकर्ताओं का मानना है कि चेंगन्नूर में उनकी मजबूत पकड़ थी और इस बदलाव से पार्टी की जीत की संभावनाएं कमजोर हो सकती हैं।

इसी तरह, कडुथुरुथी सीट बीडीजेएस को दिए जाने और रेजी लुकोस को टिकट न मिलने से क्नानाया समुदाय के एक वर्ग में नाराजगी है। इससे ईसाई वोट बैंक के दूर जाने की आशंका भी जताई जा रही है।

आरएसएस से जुड़े कुछ हलकों में भी अरनमुला और रन्नी जैसी सीटों पर प्रमुख नेताओं को मौका न दिए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। साथ ही, यह भी चर्चा है कि क्या पीएस श्रीधरन पिल्लई को अगली सूची में जगह मिलेगी या नहीं।

राजीव चंद्रशेखर के नेतृत्व पर भी सवाल उठने लगे हैं। कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि रणनीतिक फैसले केरल की जमीनी हकीकत को नजरअंदाज कर लिए जा रहे हैं।

हालांकि, प्रदेश नेतृत्व ने स्थिति को सामान्य बताते हुए कहा है कि मतभेद जल्द सुलझा लिए जाएंगे और पूरी उम्मीदवार सूची जल्द जारी होगी। लेकिन दूसरी सूची से पहले पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है कि वरिष्ठ नेताओं को संतुष्ट करना, वरना यह अंदरूनी कलह चुनाव में प्रदर्शन पर भारी पड़ सकती है।