ब्रुसेल्स, 6 मई (आईएएनएस)। तिब्बत को लेकर एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन इस क्षेत्र को एक “स्टेज-मैनेज्ड एग्जिबिट” की तरह पेश कर रहा है। तिब्बत में विदेशी पत्रकारों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों की आवाजाही को सख्ती से नियंत्रित किया जा रहा है। जो लोग यहां जाने की अनुमति पाते भी हैं, उनकी यात्रा पहले से तय कार्यक्रम (स्क्रिप्ट) के अनुसार होती है और उन्हें केवल वही स्थान दिखाए जाते हैं, जिन्हें चीनी प्रशासन दिखाना चाहता है।
दलाई लामा के भतीजे खेदरूब थोंडुप ने यूरोपियन टाइम्स में लिखा कि दशकों से, बीजिंग तिब्बत को तरक्की की जमीन के तौर पर दिखाता रहा है, जो चीनी राज में “जातीय एकता” का सबूत है। फिर भी, जो बाहरी लोग आने की कोशिश करते हैं, उनको अलग तरह के सच का सामना करना पड़ता है।
थोंडुप ने लिखा, “बाहरी लोगों की पहुंच में मामूली सुधार, कभी-कभी ग्रुप टूर, डिप्लोमैट्स के दौरे को काफी मैनेज किया जाता है, तिब्बत तक पहुंच आसान नहीं। चीन ने काफी पाबंदी लगा रखी है। ये रुकावटें अचानक नहीं हैं; ये जानबूझकर लगाई गई हैं, प्रक्रिया पारदर्शी नहीं, पत्रकारिता खुलकर नहीं की जा रही और अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों से दूर रखने की कोशिश भरपूर की जा रही है।”
रिपोर्ट आगे दावा करती है कि तिब्बत में विदेशी यात्रा के लिए अलग परमिट की जरूरत होती है, जो स्वतः नहीं मिलता। अक्सर इसके लिए अनुमोदित ट्रैवल एजेंसियों के माध्यम से आवेदन करना पड़ता है। स्वतंत्र विदेशी यात्रा लगभग असंभव है। परमिट मिलने पर भी यात्राओं की रूपरेखा पूरी तरह नियंत्रित रहती है, और यात्रियों को पूर्व-स्वीकृत मार्गों और स्थलों तक ही जाने की अनुमति होती है।
होटल और स्थानीय गतिविधियों पर निगरानी रहती है। विदेशी पत्रकारों को विशेष रूप से अवरोध का सामना करना पड़ता है, जबकि तिब्बती मूल के प्रवासी या निर्वासित समुदायों के लोग और भी सख्त निरीक्षण के दायरे में आते हैं।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि धार्मिक स्थलों के विध्वंस, तिब्बती भाषा शिक्षा में कमी, निगरानी ढांचे का विस्तार, जबरन पुनर्वास और असहमति को दबाने जैसी गतिविधियों को छुपाने के लिए विदेशी लोगों की पहुंच सीमित की गई है।
रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि तिब्बत में विदेशी प्रतिबंध केवल प्रशासनिक कारणों से नहीं हैं, बल्कि वे रणनीतिक उपकरण हैं, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय चीन की नीतियों पर सवाल न उठा सके और आधिकारिक नेरेटिव को बनाए रखा जा सके। यह एक “स्टेज-मैनेज्ड एग्जिबिट” (छलावा) है। जो लोग प्रवेश कर पाते हैं, उन्हें लगातार निगरानी, पूछताछ या यात्रा बदलने के लिए दबाव का सामना करना पड़ता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की व्यवस्था से तिब्बत की वास्तविक सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्थिति दुनिया के सामने पूरी तरह नहीं आ पाती। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि स्थानीय लोगों से स्वतंत्र रूप से बातचीत करना लगभग असंभव बना दिया गया है, क्योंकि हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है।
एक और खास बात की ओर ध्यान दिलाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, “तिब्बत के लोग विदेशी मीडिया तक पहुंच नहीं पाते और आमजन अधिकारियों के नेरेटिव को काउंटर कर अपनी बात उन तक पहुंचा नहीं पाते। इसका नतीजा ये है कि खोखले सच को प्रोपेगैंडा से भरा जा रहा है।”

