नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम, 11 मई (आईएएनएस)। लगभग तीन दशकों तक पिनाराई विजयन केरल की राजनीति में सत्ता के निर्विवाद केंद्र बने रहे। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने विद्रोहों का सामना किया, विरोध की आवाजों को दबाया, अपने प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया और अंततः सीपीआई(एम) का निर्विवाद चेहरा बन गए।
हालांकि, वामपंथ की चुनावी हार के बाद, वह व्यक्ति जो कभी राजनीतिक रूप से अजेय लगता था, अब खुद को अपने लंबे सार्वजनिक जीवन के शायद सबसे अनिश्चित मोड़ पर पाता है। जैसे-जैसे सीपीआई(एम) पोलित ब्यूरो दिल्ली में इस बात पर अहम चर्चा जारी रखे हुए है कि केरल में विपक्ष का नेतृत्व किसे करना चाहिए, यह बहस अब महज नेतृत्व के सवाल से कहीं ज्यादा बड़ी चीज में बदल गई है।
अब, कई मायनों में यह खुद पिनाराई विजयन की राजनीतिक विरासत का एक हिसाब-किताब है। जिस पल उन्होंने 1996 में बिजली मंत्री के तौर पर ईके नयनार कैबिनेट में कदम रखा, पार्टी के भीतर पिनाराई का उदय तेज और लगातार होता रहा।
1998 तक उन्होंने केरल सीपीआई(एम) के स्टेट सेक्रेटरी का पद संभाल लिया था और संगठन पर अपनी पकड़ बहुत ज्यादा अधिकार के साथ मजबूत कर ली थी। उसके बाद लगभग दो दशकों तक, पार्टी में कुछ ही बड़े फैसले उनकी मंज़ूरी के बिना लिए गए। यहां तक कि अंदर की आलोचना करने वाले भी अक्सर खुद को किनारे पाते थे।
फिर 2016 आया और पिनाराई मुख्यमंत्री बने। जल्द ही उन्होंने खुद को एक ताकतवर ऑर्गनाइजेशनल स्ट्रैटेजिस्ट से केरल के सबसे बड़े पॉलिटिकल आदमी में बदल लिया।
अगले दस सालों में जो उनके ऐतिहासिक दूसरे कार्यकाल तक फैला रहा, वे सरकार और पार्टी में अंतिम निर्णय लेने वाले बन गए। मंत्री, नौकरशाह और यहां तक कि पार्टी के वरिष्ठ नेता भी एक बेहद केंद्रीकृत व्यवस्था के तहत काम करते थे, जहां पिनाराई का अधिकार पूरी तरह से सर्वोपरि था। हालांकि, इस चुनाव में वामपंथ को मिली करारी हार ने उनकी उस ‘अजेय’ छवि को हिलाकर रख दिया है।
पोलित ब्यूरो के भीतर अब मुश्किल सवाल उठाए जा रहे हैं। क्या वही नेता, जिनके नेतृत्व में वामपंथ को अपनी सबसे बुरी हार में से एक का सामना करना पड़ा, विपक्ष के चेहरे के तौर पर बने रहें? या फिर अब वह समय आ गया है जब नई पीढ़ी के लिए दरवाज़े खोल दिए जाएं? इस दुविधा ने पार्टी को दो हिस्सों में बांट दिया है।
केरल इकाई के भीतर एक बड़ा तबका अब भी मानता है कि विधानसभा में कोई भी पिनाराई के अनुभव, आक्रामकता और विधायी राजनीति पर उनकी पकड़ की बराबरी नहीं कर सकता। हालांकि, दूसरों को डर है कि उन्हें ही सबसे आगे रखने से जनता का गुस्सा और भड़केगा; यह गुस्सा उस चीज़ के खिलाफ है जिसे कई आलोचक ‘सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण’ और ‘शासन का बढ़ता हुआ दुर्गम तरीका’ बताते हैं। इस अनिश्चितता को और बढ़ाने वाली बात है पिनाराई की अपनी चुप्पी।
सूत्रों के मुताबिक, इस अनुभवी नेता ने न तो विपक्ष के नेता का पद मांगा है और न ही इसे पूरी तरह से ठुकराया है। इसके बजाय, उन्होंने यह संदेश दिया है कि वे कोई भी जिम्मेदारी तभी स्वीकार करेंगे, जब पूरी पार्टी नेतृत्व इसके लिए जोर दे। यह सोच-समझकर अपनाई गई रणनीति उन्हें ‘सत्ता का भूखा’ दिखने से बचाती है, और साथ ही यह भी सुनिश्चित करती है कि किसी भी अंतिम फैसले की जिम्मेदारी अकेले पार्टी पर ही आए।
इस महीने के आखिर में 81 साल के होने जा रहे पिनाराई विजयन का भविष्य और उनकी सेहत को लेकर चल रही दबी ज़बान की राजनीतिक चर्चाएं अब उतना पक्का नहीं लगता जितना पहले कभी हुआ करता था।
एक ऐसे नेता के लिए, जिन्होंने लगभग 30 सालों तक बिना किसी रुकावट के केरल की राजनीति पर राज किया, आने वाले दिन और केंद्रीय व राज्य नेतृत्व की अहम बैठकें न सिर्फ यह तय करेंगी कि विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा बल्कि यह भी कि पिनाराई के दौर को आखिरकार किस तरह याद किया जाएगा।

