प्रियंका चतुर्वेदी ने की निष्पक्ष परिसीमन की मांग, राजनीतिक हस्तक्षेप से बचने पर दिया जोर

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नई दिल्ली, 5 अप्रैल (आईएएनएस)। शिवसेना (यूबीटी) नेता प्रियंका चतुर्वेदी ने रविवार को कहा कि प्रभावी प्रतिनिधित्व और विकास सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन आवश्यक है, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप अनुचित राजनीतिक लाभ नहीं मिलना चाहिए या पक्षपातपूर्ण विचारों से प्रभावित नहीं होना चाहिए।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रियंका चतुर्वेदी ने सांसदों पर बढ़ते बोझ को उजागर करते हुए कहा, परिसीमन एक आवश्यकता है। लोकसभा में सांसदों को छह बड़ी आबादी वाली विधानसभा क्षेत्रों में खुद को फैलाना पड़ता है, जिससे विकास कार्यों पर ध्यान भी प्रभावित होता है।” उन्होंने बताया कि परिसीमन के प्रयास वर्षों से बार-बार स्थगित किए जा रहे हैं और उन्होंने एक निष्पक्ष प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया।

प्रियंका चतुर्वेदी ने कहा, “परिसीमन लाने के सभी प्रयास वर्षों से टलते रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब तक हर निर्वाचन क्षेत्र का निष्पक्ष तरीके से सीमांकन नहीं किया जाता (जिससे सत्तारूढ़ पक्ष को असंतुलित लाभ न मिले और न ही इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप हो), तब तक यह प्रक्रिया पूरी करना जरूरी है।

लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों के परिसीमन का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया है। दरअसल, 1971 की जनगणना के आधार पर लागू की गई संवैधानिक रोक अब खत्म होने की ओर है।

1 अप्रैल 2026 से जनगणना प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसके अपडेट आंकड़े 2027 तक उपलब्ध होने की संभावना है। इसके बाद कानून के तहत सीमांकन की प्रक्रिया, जिसमें निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण और राज्यों के बीच सीटों का पुनर्वितरण शामिल होता है, आवश्यक हो जाएगी।

परिसीमन पर चल रही बहस का सीधा संबंध महिला आरक्षण कानून से भी है, जिसे औपचारिक रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 कहा जाता है। यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करता है, हालांकि इस कानून का लागू होना अगले जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन की प्रक्रिया पर निर्भर करता है।

पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रियंका चतुर्वेदी ने इस कानून का लगातार समर्थन किया है, लेकिन साथ ही इस बात पर जोर दिया है कि इसे केवल एक दूर के वादे के रूप में न रखा जाए, बल्कि समय पर और प्रभावी तरीके से लागू किया जाए।

इधर सरकार के भीतर हालिया चर्चाओं में—जिनमें संशोधन के प्रस्ताव और संसद का विशेष सत्र बुलाने की संभावना भी शामिल है—इस प्रक्रिया के कुछ हिस्सों को परिसीमन से अलग करने या इसे तेज करने के विकल्पों पर विचार किया गया है।