नई दिल्ली, 23 जुलाई (आईएएनएस)। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने ‘प्रशस्त’ ऐप के माध्यम से स्कूली बच्चों में सीखने की अक्षमताओं और दिव्यांगता का शुरुआती चरण में ही पता लगाने का आग्रह किया है। बुधवार को उन्होंने कहा कि सरकार शिक्षा मंत्रालय की ओर से विकसित प्रशस्त ऐप के जरिए सीखने की अक्षमता वाले बच्चों की जल्द पहचान करने को प्राथमिकता दे रही है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि नेशनल एजुकेशन पॉलिसी (एनईपी) 2020 के तहत शुरू की गई इस पहल का मकसद अलग-अलग क्षमताओं वाले बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना है। शिक्षा मंत्री ने ये बातें संसद की कार्यवाही स्थगित होने के दौरान ओडिशा के भाजपा सांसदों के साथ हुई बैठक में कहीं। उन्होंने कहा कि सांसदों ने राज्य के विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की, जिसमें सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में मुश्किलों का सामना कर रहे बच्चों की शिक्षा पर खास ध्यान दिया गया।
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा, “हमारा मुख्य मकसद शुरुआती चरण में संघर्ष कर रहे बच्चों की पहचान करना, उन्हें सही तरीकों से पढ़ाना और उनके शैक्षिक नतीजों में सुधार लाना है।”
बता दें कि समग्र शिक्षा अभियान के तहत एनसीईआरटी की ओर से तैयार किया गया ‘प्रशस्त’ (प्री-असेसमेंट होलिस्टिक स्क्रीनिंग टूल) ऐप स्कूलों को ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ के तहत मान्यता प्राप्त 21 तरह की दिव्यांगताओं के लिए बच्चों की स्क्रीनिंग करने के लिए विकसित किया गया है।
‘प्रशस्त’ ऐप के माध्यम से शिक्षक शुरुआती स्क्रीनिंग करते हैं, जबकि विशेष शिक्षक आगे की मदद के लिए मामलों की पुष्टि और वर्गीकरण करते हैं। इस टूल को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि बच्चों को गलत लेबल न लगाया जाए और ‘यूनिक डिसेबिलिटी आईडी’ पोर्टल के माध्यम से उन्हें सर्टिफिकेशन, रियायतें और परीक्षा में विशेष सुविधाएं मिल सकें।
मंत्री ने कहा कि ओडिशा के सांसदों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों में जागरूकता अभियानों को प्राथमिकता देने का संकल्प लिया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्कूल इस ऐप को अपनाएं और अलग-अलग क्षमताओं वाले बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ें।
उन्होंने कहा कि यह पहल ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ और एनईपी 2020 के तहत समावेशी शिक्षा के लिए शुरू किया गया है।
देश को लंबे समय से दिव्यांग छात्रों की मदद करने में चुनौतियां हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि शुरुआती पहचान और समय पर मदद से स्कूल छोड़ने की दर को कम किया जा सकता है और सीखने के नतीजों में सुधार लाया जा सकता है। ‘प्रशस्त’ पहल को स्कूल स्तर पर समावेशी तौर-तरीकों को लागू करने की एक व्यवस्थित कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

