नई दिल्ली, 15 सितंबर (आईएएनएस)। ब्रज, अवधी, मैथिली, राजस्थानी और भोजपुरी जैसी समृद्ध लोक बोलियों की विरासत को अपने साथ जोड़ने वाली हिंदी भाषा ने देश की बहुसंख्यक आबादी तक अपनी पहुंच बनाई। हिंदी दिवस पर आईएएनएस ने लेखिका अंकित जैन से बातचीत की।
आईएएनएस से बातचीत करते हुए अंकिता जैन ने कहा, “हिंदी, हमेशा से ही एक समग्र भाषा रही है। हिंदी ने अन्य भाषाओं के शब्दों को अपने साथ जोड़ा है। मुझे नहीं लगता कि आज से 30 वर्ष पुराने लेखकों ने उस समय के चलन वाले शब्दों को इस्तेमाल न किया हो। कई सारे लेखकों की किताबों में देखा जा सकता है कि उन्होंने अलग-अलग भाषाओं में किताबें लिखी हैं और अलग-अलग शब्दों को इस्तेमाल किया है।”
अंकिता ने कहा, “अंग्रेजी के शब्द बहुत ज्यादा इसलिए दिखने लगे हैं, क्योंकि लोकल भाषा में उन शब्दों का इस्तेमाल ज्यादा होने लगा है। यह कहा जा सकता है कि अब बोलचाल की भाषा का प्रयोग हिंदी की किताबों में बहुत ज्यादा बढ़ गया है। पहले ऐसा नहीं होता था, पहले साहित्यिक भाषा को बहुत ज्यादा महत्व दिया जाता था। उदाहरण के लिए कॉल को हम कुछ और नहीं कह सकते। ट्रेन को लौह पथ गामिनी तो नहीं कहा जा सकता, मुझे नहीं लगता कि कभी मुंशी प्रेमचंद या उनके समकक्ष के लेखकों ने ट्रेन को लौह पथ गामिनी अपनी किताब लिखा होगा। उन्होंने ट्रेन को ट्रेन ही लिखा या रेल लिखा होगा। दोनों ही अंग्रेजी के शब्द हैं।”
उन्होंने कहा कि अन्य भाषाओं से हिंदी में एक अंतर मुझे दिखता है, जैसे केरल में सन लाइट को लोगों को सूर्य प्रकाश बोलते हुए सुना। हिंदी में हमने उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल अधिक किया। हिंदी बहुत समग्र भाषा है, उसके पास अपने बहुत सारे शब्द हैं, लेकिन हमने उनका इस्तेमाल करना छोड़ दिया। अब के बच्चे किताबों, कविता और कहानियों में उर्दू के शब्दों के बजाय हिंदी के शब्दों का प्रयोग कर रहे हैं। उदाहरण के लिए ‘शाम’ को ‘संध्या’ लिखा जा रहा है। यह शुद्ध हिंदी का शब्द है।
अंकिता जैन ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि हिंदी को अपेक्षित पहचान मिल गई है। हिंदी मध्य भारत और उत्तर भारत की भाषा है, इसके अलावा दक्षिण और पश्चिम भारत के राज्यों की अपनी एक भाषा है। मेरा मानना है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी को अपेक्षित पहचान मिली तो है, लेकिन अपने देश में बहुत सारे राज्यों के लोग ऐसे हैं, जो हिंदी को नहीं अपनाना चाहते हैं।”
हिंदी में ‘गाली’ के प्रयोग को लेकर अंकिता ने कहा, “गाली के पक्ष में मैं कभी भी नहीं रही हूं। चाहे वह साहित्य में लिखी गई हो या फिर सिनेमा में दिखाई गई हो। मेरी मां ने मुझे एक बार समझाया था कि पहले के जमाने में ‘धिक’ यानी ‘धिक्कार’ शब्द एक ‘गाली’ होती थी। लेकिन अब हमने गालियों को इतना आम बोलचाल की भाषा बना दिया कि ‘गाली’ यूं ही बोल दिया जाता है। मुझे नहीं लगता कि ‘गाली’ किसी को समग्र बनाती है या उसका बोलचाल की भाषा में आना सामान्य माना जाना चाहिए। इसके पक्ष में मैं कभी भी नहीं रही, क्योंकि मैं ‘गाली’ को नकारात्मक मानती हूं। नकारात्मक शब्द हमारे व्यक्तित्व को खराब करते हैं। सिनेमा की वजह से भाषा पर इसका प्रभाव ज्यादा बढ़ा है।”
अंकिता ने कहा, “सोशल मीडिया ने हिंदी को बहुत प्रभावित किया है। मेरा कहना है कि पहले जो लोग हिंदी का मापदंड तय करते थे, वे कहीं न कहीं ‘मठाधीश’ बनते जा रहे थे। सोशल मीडिया ने उनकी ‘मठाधीशी’ खत्म कर दी है। सोशल मीडिया ने बहुत अच्छा लिखने वाले लेखकों को जन्म दिया। हर चीज के जो पहलू होते हैं, यह भी कहा जा सकता है कि बहुत खराब लिखा हुआ सोशल मीडिया में बहुत पॉपुलर हो गया। लेकिन वह पॉपुलर हो गया इससे यह साबित नहीं होता है कि वह बहुत अच्छा लिखा हुआ है। हर किसी का अपना अच्छा या बुरा पक्ष हो सकता है। किसी को बहुत अच्छा लग रहा है, शायद इसलिए पॉपुलर हुआ। लेकिन अगर साहित्य को बढ़ाने की नजर से देखा जाए तो मुझे नहीं लगता कि वह बहुत अच्छा था।”
उन्होंने आगे कहा, “साहित्य वह होना चाहिए जो हमारे भीतर कुछ परिवर्तन ला रहा हो। मैं इसी को साहित्य मानती हूं, जिसे पढ़कर हम अपने भीतर कुछ बदल सकें या हमारे ऊपर उसका कुछ प्रभाव हो रहा हो। जो सिर्फ अच्छा लग रहा हो, वही साहित्य नहीं हो सकता। साहित्य की परिभाषा हर किसी के लिए अलग हो सकती है। सोशल मीडिया ने इसको बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। सोशल मीडिया ने हमें कुछ बुरी तो कुछ अच्छी चीजें दी हैं।”
अंकिता जैन ने कहा कि मुझे नहीं लगता कि ‘नई हिंदी’ या ‘हिंदी का नया जन्म’ ये कोई नई चीज होनी चाहिए। हिंदी ने हमेशा ही खुद को नयापन दिया है। चाहे फारसी यहां आए हों या उससे पहले अंग्रेज यहां आए हों, कोई भी हमारे देश में आया हो जिसने हमारी हिंदी में अपने शब्दों का मिश्रण किया हो। ऐसे में हिंदी का हर बार एक नया जन्म हुआ है। हम उसका फिर से एक नया जन्म कह सकते हैं, क्योंकि उसने खुद को वापस अपग्रेड किया है। हिंदी, फोन या लैपटॉप के एक सिस्टम की तरह है, जो हमेशा अपग्रेड हो रही है। खुद में नई चीजों को सम्मिलित कर रही है। हिंदी का नया जन्म तो बहुत पहले हो चुका था, लेकिन ये कहा जा सकता है कि समय के साथ अपग्रेड होती जाती है।”
उन्होंने कहा कि हिंदी आम बोलचाल की भाषा से अपने लिए शब्द उठाती है और अपने शब्दकोश में जोड़ती जाती है। पहले के लेखकों ने अपने दौर के शब्दों का इस्तेमाल किया और आज के लेखक भी वही कर रहे हैं।
