नई दिल्ली, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। पीओके (पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर) में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पाकिस्तानी सुरक्षा बलों की हिंसक कार्रवाई महीनों से जारी है। इसे लेकर कई सवाल भी हैं। ये सवाल मानवाधिकार उल्लंघन, गलत तरीके से हिरासत में रखने और न्यायेतर हत्याओं से जुड़े हैं। एक रिपोर्ट में उन परिवारों की पीड़ा को जाहिर किया गया है।
पीओके में लोगों ने बिजली की बढ़ती कीमतों और जीवन-यापन की बढ़ती लागत को लेकर विरोध शुरू किया था, लेकिन धीरे-धीरे यह उस इलाके के संवैधानिक और राजनीतिक ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई। जमीनी कार्यकर्ताओं के संगठन, ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी’ (जेएएसी) ने 27 जुलाई से 10 अगस्त के बीच चरणोंबद्ध चुनाव के बहिष्कार का आह्वान किया था। उनका तर्क था कि मौजूदा व्यवस्था स्थानीय निवासियों के हितों और आकांक्षाओं का ठीक से प्रतिनिधित्व करने में विफल रही है।
‘द इंडिपेंडेंट’ की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस कदम के बाद समूह पर प्रतिबंध लगा दिया गया और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई की।
इसके बाद, पाकिस्तानी सरकार ने कड़े आतंकवाद-रोधी कानूनों के तहत जेएएसी पर प्रतिबंध लगा दिया, उसके कई नेताओं को गिरफ्तार किया और आंदोलन को दबाने के लिए एक सुरक्षा अभियान शुरू किया। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अभियान के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन, मनमाने ढंग से हिरासत में लेने और बिना कानूनी प्रक्रिया के हत्या (एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग) के आरोप भी लगे।
रिपोर्ट में 26 वर्षीय फहद बरकत के मामले का भी जिक्र किया गया है। उनकी बहन दो महीने से ज्यादा समय तक यह मानती रहीं कि उन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया है और उम्मीद करती रहीं कि उन्हें आखिरकार रिहा कर दिया जाएगा। बरकत रावलकोट के एक सैन्य अस्पताल में रक्तदान करने गए थे, लेकिन कभी घर नहीं लौटे। उन्होंने अपनी बहन को आखिरी संदेश 7 जून को रात 11:31 बजे भेजा था, और परिवार को बहुत बाद में पता चला कि उनके साथ क्या हुआ था।
बरकत की बहन के अनुसार, रात 1 बजे से कुछ समय पहले अस्पताल के गेट में घुसते समय उनकी गर्दन में गोली मारी गई थी। इस घटनाक्रम को यूके में रजिस्टर्ड संगठन ‘जम्मू कश्मीर ह्यूमन राइट्स ऑब्जर्वेटरी’ (जेकेएचआरओ) ने ‘द इंडिपेंडेंट’ के साथ साझा की गई 47 पन्नों की रिपोर्ट में दर्ज किया है, जिसमें घटना के बारे में परिवार का बयान शामिल है।
तब से जेकेएचआरओ ने अधिकारियों से पीओके में नागरिकों के लापता होने, हिरासत में लिए जाने और मौत से जुड़े हालात के बारे में जवाब देने की मांग की है।
अपनी विस्तृत रिपोर्ट में, संगठन ने मांग की कि अधिकारी “लिखित जवाब, हताहतों और हिरासत के रिकॉर्ड, और ऑपरेशनल ऑर्डर” उपलब्ध कराएं ताकि कथित उल्लंघनों के पीछे के तथ्यों का पता लगाया जा सके। ‘द इंडिपेंडेंट’ के अनुसार, बरकत के परिवार ने जेकेएचआरओ को बताया कि उन्होंने फोन कॉल और मैसेज के जरिए उससे संपर्क करने की कई बार कोशिश की, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला, जिससे उन्हें उसके ठिकाने के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। वहीं, पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ ने जून में एक खबर छापी जिसमें रावलकोट झड़प का जिक्र था। इसमें मारे गए नागरिकों की लिस्ट में बरकत का नाम भी था।
इसके अलावा, यह आरोप भी सामने आए कि अधिकारियों ने बरकत का शव तब तक नहीं सौंपा, जब तक कि उसका परिवार उसे आतंकवादी बताने वाले बयान पर हस्ताक्षर करने के लिए सहमत नहीं हो गया।
जेकेएचआरओ ने एक अलग रिपोर्ट में दावा किया, “अधिकारी शव तब तक रोके हुए थे जब तक परिवार ने एक बयान पर हस्ताक्षर नहीं किए जिसमें उसे मुठभेड़ में मारा गया आतंकवादी बताया गया था।”
मानवाधिकार संगठन ने बरकत की मौत से जुड़ी घटनाओं के क्रम और उसके दफन किए जाने के हालात पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन ने अधिकारियों से ज्यादा पारदर्शिता की मांग की है, जिसमें सीसीटीवी फुटेज, अस्पताल के ब्लड डोनर रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम के दस्तावेज और दफन करने के रिकॉर्ड जारी करना शामिल है, ताकि यह पता चल सके कि क्या हुआ था और जिम्मेदारी तय की जा सके।
जेकेएचआरओ ने यह भी कहा है कि उसने अधिकारियों को अपनी रिपोर्ट में लगाए गए आरोपों का जवाब देने के लिए आमंत्रित किया है, ताकि उन्हें इस मामले से जुड़े सवालों पर अपनी बात रखने का मौका मिल सके।
बरकत का मामला कोई अकेला मामला नहीं है, क्योंकि पीओके में कई अन्य परिवार भी अपने लापता रिश्तेदारों की तलाश कर रहे हैं या उनकी मौत के हालात के बारे में स्पष्ट जानकारी चाहते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, जहां जेएएसी ने सार्वजनिक रूप से 5 जून के बाद से 100 से ज्यादा लोगों के मौतों की जानकारी दी है, वहीं स्थानीय निवासियों का कहना है कि मरने वालों की असल संख्या इससे कहीं ज्यादा है।
रिपोर्ट में शौकत नवाज मीर का मामला भी उजागर किया गया है, जिनका परिवार 30 जून को धीरकोट से उनकी गिरफ्तारी के तीन महीने से अधिक समय बाद भी उनके ठिकाने के बारे में जानकारी का इंतजार कर रहा है। इतना समय बीत जाने के बावजूद, उनके रिश्तेदारों को उनकी स्थिति के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मिली है।
रिपोर्ट में एक और मामला जाबिर मुमताज का बताया गया है, जिन्हें कथित तौर पर 5 सितंबर को सुरक्षाकर्मियों ने मार डाला था, जबकि वे दो हफ्ते से हिरासत में थे। उनके परिवार ने भी दावा किया कि अधिकारियों ने उनका शव सौंपने के लिए यह शर्त रखी कि परिवार उन्हें आतंकवादी बताने वाले बयान पर हस्ताक्षर करे। रिपोर्ट के मुताबिक, परिवार ने बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, जिसके बाद अधिकारियों ने कथित तौर पर खुद ही दफनाने की प्रक्रिया पूरी की।
इन मामलों ने पीओके में कार्रवाई के दौरान आम नागरिकों के साथ किए गए बर्ताव को लेकर पारदर्शिता, भरोसेमंद जांच और जवाबदेही की मांग को और तेज कर दिया है।
