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विरोध प्रदर्शनों को वेक-अप कॉल माने सरकार, शिक्षा व्यवस्था में सक्रिय रूप से लागू करे सुधार: गीतांजलि आंग्मो (आईएएनएस इंटरव्यू)

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भुवनेश्वर, 3 सितंबर (आईएएनएस)। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने गुरुवार को कहा कि सरकार को जारी विरोध प्रदर्शनों को एक ‘वेक-अप कॉल’ के रूप में लेना चाहिए और परीक्षा तथा शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधारों को सक्रिय रूप से लागू करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को छोटा या अलग-थलग मामला नहीं समझा जाना चाहिए। यदि शिक्षा और परीक्षा प्रणाली में सार्थक सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में यह बड़ा सामाजिक दबाव और व्यापक आंदोलन का रूप ले सकता है।

आईएएनएस को दिए विशेष साक्षात्कार में गीतांजलि आंग्मो ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), परीक्षा सुधार, शिक्षकों की भूमिका, ‘वंदे मातरम्’ विवाद, भारतीय दार्शनिक परंपरा, राजनीतिक ध्रुवीकरण, राष्ट्रभक्ति और भारतीय ज्ञान परंपरा जैसे कई मुद्दों पर विस्तार से अपनी बात रखी।

आईएएनएस: क्या एनईपी भारतीय सोच को फिर से शिक्षा व्यवस्था में वापस लाने का रास्ता बना सकती है?

गीतांजलि आंग्मो: हां। एनईपी एक दस्तावेज के रूप में बहुत अच्छी है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल इसका क्रियान्वयन है। हम अक्सर गुरुकुल व्यवस्था की बात करते हैं। उसकी सबसे बड़ी ताकत कोई तय पाठ्यक्रम या विशेष शिक्षण पद्धति नहीं थी, बल्कि उसका केंद्र गुरु था। गुरु अपने आचरण और व्यक्तित्व से बच्चे के व्यवहार और चरित्र का निर्माण करते थे। शिक्षक केवल जानकारी देने या पाठ्यक्रम पूरा करने वाले व्यक्ति नहीं थे, बल्कि उनका दायित्व बच्चे के संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करना था।

उन्होंने कहा कि आज शिक्षण कई बार अंतिम विकल्प वाला पेशा बन गया है। जब कोई इंजीनियर, डॉक्टर या आईएएस नहीं बन पाता, तब कुछ लोग शिक्षक बनते हैं। हमें इस सोच को बदलना होगा। अगर हम एनईपी को सही ढंग से लागू करना चाहते हैं तो शिक्षकों को समाज में ऊंचा दर्जा और बेहतर वेतन देना होगा। शिक्षण को सबसे सम्मानित और बेहतर भुगतान वाले पेशों में शामिल करना चाहिए। एक शिक्षक का बच्चे के विकास पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए यदि शिक्षा व्यवस्था बदलनी है तो सबसे पहले शिक्षक को केंद्र में रखना होगा। ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां प्रतिभाशाली और सक्षम लोग स्वयं शिक्षक बनना चाहें।

गीतांजलि आंग्मो का मानना है कि हर बच्चे को कम से कम दसवीं तक समान और गुणवत्तापूर्ण बुनियादी शिक्षा मिलनी चाहिए, चाहे वह सरकारी स्कूल में पढ़े या निजी स्कूल में। न्यूनतम गुणवत्ता वाली शिक्षा हर बच्चे का अधिकार होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि आज हम देख रहे हैं कि बच्चे निजी स्कूलों की ओर जा रहे हैं, जबकि कई जगह सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं या उनकी स्थिति खराब है। कई स्थानों पर बच्चों के पोषण जैसी बुनियादी जरूरतें भी चुनौती बनी हुई हैं। अगर हम विश्व नेतृत्व की बात करते हैं तो सबसे पहले अपने बच्चों को मजबूत बनाना होगा।

उन्होंने कहा कि एनईपी एक विचार है, लेकिन किसी भी विचार की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। केवल दस्तावेज बना देने से शिक्षा व्यवस्था नहीं बदलती। इसके लिए वर्षों तक लगातार जमीनी स्तर पर काम करना पड़ता है। दुनिया के जिन देशों ने शिक्षा व्यवस्था में सफल सुधार किए, उन्होंने यह काम कई दशकों तक निरंतर किया। इसलिए शिक्षा सुधार को राजनीतिक चक्र से अलग रखना होगा।

गीतांजलि आंग्मो ने आईएएनएस से कहा कि मेरा मानना है कि शिक्षा जैसे 20-30 साल लंबे विषय के लिए एक स्वतंत्र शिक्षा आयोग होना चाहिए। यह आयोग राजनीतिक दलों के बदलने से प्रभावित नहीं होना चाहिए। कई बार एक सरकार सुधार शुरू करती है और दूसरी सरकार उसे बदल देती है। शिक्षा पांच साल की परियोजना नहीं, बल्कि दशकों का प्रयास है। इसलिए इसे राजनीति से कुछ हद तक संस्थागत सुरक्षा मिलनी चाहिए।

अब तक हमने मुख्य रूप से परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने और पेपर लीक रोकने पर ध्यान दिया है। लेकिन परीक्षा व्यवस्था में इससे कहीं बड़े सुधार की जरूरत है। सबसे पहले हमें यह पूछना होगा कि परीक्षा में आखिर हम जांच क्या रहे हैं? क्या केवल याददाश्त या बच्चे की समझ और ज्ञान के उपयोग की क्षमता? इसके अलावा क्या हम बच्चों का दिमाग केवल जानकारी से भर रहे हैं या उनका संपूर्ण व्यक्तित्व विकसित कर रहे हैं? बच्चे का शारीरिक, भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास भी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए। शिक्षा केवल यह नहीं होनी चाहिए कि बच्चा कितनी जानकारी याद रख सकता है और परीक्षा में लिख सकता है, बल्कि उसका उद्देश्य संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास होना चाहिए।

आईएएनएस: क्या आपको लगता है कि अगर मौजूदा शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो बड़ा आंदोलन खड़ा हो सकता है?

गीतांजलि आंग्मो: मेरा मानना है कि सरकार को इस आंदोलन को एक वेक-अप कॉल के रूप में लेना चाहिए और सक्रिय रूप से सुधार लागू करने चाहिए। यह कोई छोटा मुद्दा नहीं है। अगर परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में बड़ा सामाजिक दबाव और आंदोलन खड़ा हो सकता है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले। यह हर परिवार के लिए बेहद भावनात्मक और महत्वपूर्ण विषय है। यही हमारे देश का भविष्य और हमारी युवा पीढ़ी है।

गीतांजलि आंग्मो ने कहा कि पिछले वर्षों में हमने सड़कों और अन्य भौतिक बुनियादी ढांचे पर काफी ध्यान दिया है, जो जरूरी भी है। लेकिन किसी देश को सॉफ्ट इंफ्रास्ट्रक्चर की भी उतनी ही जरूरत होती है। शिक्षा और स्वास्थ्य उसी सॉफ्ट इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा हैं। इसलिए शिक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना जरूरी है। एनईपी को एक दीर्घकालिक राष्ट्रीय परियोजना के रूप में देखा जाना चाहिए। फिनलैंड ने अपनी शिक्षा व्यवस्था में सुधार करने में दशकों लगाए थे। शिक्षा सुधार ऐसा काम नहीं है, जिसके परिणाम एक-दो साल में दिखाई दें। इसलिए हमें ऐसी संस्थागत व्यवस्था चाहिए, जो सरकारें बदलने के बावजूद शिक्षा सुधारों को आगे बढ़ाती रहे। एनईपी केवल अलमारी में रख दिया जाने वाला दस्तावेज नहीं होना चाहिए। इसे स्कूलों, कक्षाओं और बच्चों के जीवन में जमीन पर लागू करना होगा। असली चुनौती क्रियान्वयन की है।

गीतांजलि आंग्मो ने कहा कि सरकार को मौजूदा स्थिति को एक अवसर के रूप में देखना चाहिए और मुद्दा बड़ा बनने से पहले सुधार करने चाहिए। अगर माता-पिता, छात्र और युवा यह महसूस करने लगेंगे कि व्यवस्था उन्हें वह अवसर और शिक्षा नहीं दे रही जिसकी उन्हें जरूरत है, तो सामाजिक दबाव स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। इसलिए सरकार को बड़े आंदोलन का इंतजार करने के बजाय पहले ही कदम उठाने चाहिए।