नई दिल्ली, 19 मई (आईएएनएस)। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार अगस्त 2024 में हटने और नई सरकार बनने के बाद से ‘भारत-विरोधी’ बयानों का एक सिलसिला शुरू हो गया। इसके बाद से लगातार ये कहा जा रहा है कि बांग्लादेश और भारत के संबंध में तनाव बढ़ गया है। हालांकि इसके बावजूद, भारत से बांग्लादेश को होने वाली बिजली आपूर्ति में कोई बाधा नहीं आई। वर्षों में तैयार किए गए सीमा-पार बिजली ढांचे के जरिए दोनों देशों के बीच ऊर्जा आपूर्ति लगातार जारी रही।
दोनों देशों ने वर्षों तक मिलकर ऊर्जा साझेदारी को मजबूत बनाने का काम किया था। इसके तहत पाइपलाइन, बिजली ग्रिड और साझा बुनियादी ढांचे का निर्माण किया गया, जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद अहम बन चुका था। ऐसे में चिंता जताई जा रही थी कि ढाका में अचानक हुए राजनीतिक बदलाव से कहीं यह पूरा तंत्र प्रभावित न हो जाए।
यूरेशिया रिव्यू में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, सितंबर 2024 तक भारत और बांग्लादेश के बीच राजनीतिक संवाद कठिन दौर में पहुंचने और वीजा सामान्यीकरण जैसी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के धीमा पड़ने के बावजूद भारत से बांग्लादेश को बिजली आपूर्ति लगभग पहले जैसी ही जारी रही।
इस आर्टिकल में 18 सितंबर, 2024 को भारत के नेशनल लोड डिस्पैच सेंटर के आधिकारिक डाटा का हवाला दिया गया है, जिसमें एक ही दिन में बांग्लादेश को सप्लाई की गई लगभग 47.7 मिलियन यूनिट बिजली दर्ज की गई। इससे पता चलता है कि राजनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव के बावजूद दोनों देशों के ऊर्जा सिस्टम के बीच कितना गहरा जुड़ाव बना रहा।
यह ऊर्जा संबंध इसलिए कायम रहा, क्योंकि 2024 तक भारत-बांग्लादेश बिजली सहयोग किसी एक नेता की सद्भावना या किसी खास कूटनीतिक माहौल पर निर्भर रहने की सीमा से काफी आगे बढ़ चुका था।
यह साझेदारी दीर्घकालिक समझौतों, ग्रिड ऑपरेटरों के बीच तकनीकी समन्वय व्यवस्था और आपस में जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर पर आधारित थी। ऐसे में इसे रोकने से दोनों देशों को तुरंत और गंभीर नुकसान उठाना पड़ता।
रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश के कारखाने, अस्पताल और शहरी बिजली नेटवर्क भारतीय बिजली आयात पर काफी हद तक निर्भर हो चुके थे। वहीं, भारत के ग्रिड ऑपरेटरों की भी व्यावसायिक और तकनीकी जिम्मेदारियां तय थीं। इस वजह से यह व्यवस्था राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद लगातार चलती रही।
लेख में यह भी बताया गया कि उस समय बांग्लादेश पहले से ही आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा था। विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव था, ईंधन आयात महंगा हो चुका था और राजनीतिक बदलाव के बाद संस्थाओं पर जनता का भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं हुआ था। ऐसे में यदि बिजली आपूर्ति बाधित होती, तो फैक्ट्रियों का काम प्रभावित होता, शहरों में लोड शेडिंग बढ़ती और जनता की नाराजगी सरकार के लिए बड़ा संकट बन सकती थी।
इसके बावजूद बिजली आपूर्ति जारी रहने से औद्योगिक गतिविधियां सामान्य स्तर पर बनी रहीं और नई सरकार एक बड़े संकट से बच गई। लेख में यह भी कहा गया कि भारत ने इस स्थिति का राजनीतिक दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया।
आर्टिकल में कहा गया, “बिजली की रुकावट की वजह से फैक्ट्रियों में अंधेरा छा जाना, शहरों में लोड-शेडिंग का बढ़ना और सरकार की कमजोर स्थिति के समय लोगों की निराशा का बढ़ना बहुत नुकसानदायक होता, लेकिन हकीकत में बिजली आती रही, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन काम करने लायक स्तर पर रहा और नई सरकार को एक ऐसे संकट से बचा लिया गया जिसकी उसे जरूरत नहीं थी।”
आर्टिकल में इस बात पर जोर दिया गया है कि यह भारत की तारीफ है जिसने उस समय बांग्लादेश के राजनीतिक बदलाव से पैदा हुए संभावित फायदे का इस्तेमाल नहीं करने का फैसला किया।
आर्टिकल में कहा गया, “आम तौर पर जरूरी ऊर्जा इंपोर्ट के लिए पड़ोसी पर निर्भर देश, असल में, कमजोरी स्थिति में अपने पड़ोसी के दबाव में कमजोर होता है। हालांकि, भारत ने वह दबाव नहीं डाला। उसने संस्थानिक प्रतिबद्धता को अपना काम करने दिया, ऊर्जा संबंध को दोनों सरकारों के बीच पैदा हुई राजनीतिक मुश्किलों से अलग माना। वह रोक अपने आप में एक तरह की कूटनीति थी।”

