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महाराष्ट्र में जल संकट से निपटने के लिए युद्धस्तर पर करें काम: मंत्री गुलाबराव पाटिल

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मुंबई, 30 सितंबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र के 265 से अधिक तालुकाओं में सूखे जैसी स्थिति के बीच राज्य के जलापूर्ति एवं स्वच्छता मंत्री गुलाबराव पाटिल ने बुधवार को अधिकारियों को पानी के टैंकरों पर निर्भरता कम करने के लिए स्थायी उपायों को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए।

प्रमुख उपायों में उपलब्ध जल भंडार का सख्ती से प्रबंधन, मौजूदा जल स्रोतों को मजबूत करना, नालों से गाद निकालना, मिट्टी और जल संरक्षण से जुड़ी परियोजनाओं में तेजी लाना और 75 प्रतिशत से अधिक पूरी हो चुकी जलापूर्ति योजनाओं को संभावित जल संकट से निपटने के लिए तत्काल शुरू करना शामिल है।

मंत्री ने सभी जिलों को 15 अक्टूबर तक अपनी जल संकट कार्ययोजना तैयार करने और पानी की अनधिकृत निकासी पर सख्ती से रोक लगाने का भी निर्देश दिया।

पाटिल ने छत्रपति संभाजीनगर, नासिक और पुणे संभाग में संभावित जल संकट की समीक्षा बैठक के दौरान ये निर्देश दिए।

मंत्री ने कहा, “जल संकट पैदा होने के बाद कदम उठाने के बजाय संभावित कमी को ध्यान में रखते हुए पहले से योजना बनाना जरूरी है।”

उन्होंने अधिकारियों से झीलों, बांधों, कुओं और दूसरे जलाशयों में उपलब्ध पानी का सही तरीके से इस्तेमाल और संरक्षण करने को कहा। साथ ही जल संकट गंभीर होने से पहले वैकल्पिक जल स्रोतों, टैंकरों और जरूरी बुनियादी ढांचे को तैयार रखने के निर्देश दिए।

उन्होंने कहा कि जिन जलापूर्ति योजनाओं का 75 प्रतिशत या उससे अधिक काम पूरा हो चुका है और जिनके पास पानी का उपयोग करने योग्य स्रोत है, उन्हें तत्काल चालू किया जाए।

प्रशासनिक, तकनीकी या बुनियादी ढांचे से जुड़ी समस्याओं को दूर करने के लिए अधिकारियों को संबंधित जिला कलेक्टरों के साथ सीधे समन्वय करने को कहा गया है। इनमें नल कनेक्शन, पाइपलाइन बिछाने, पानी की टंकियों के लिए जगह उपलब्ध कराने और जरूरी मंजूरी जैसे मुद्दे शामिल हैं।

मंत्री ने टैंकरों पर निर्भर गांवों में लंबित जलापूर्ति परियोजनाओं को युद्धस्तर पर पूरा करने के निर्देश दिए।

उन्होंने कहा कि सरकार का मुख्य उद्देश्य स्थायी बुनियादी ढांचा तैयार करना है, ताकि पानी पहुंचाने के लिए टैंकरों की जरूरत खत्म हो सके।

जल संकट की आशंका वाले क्षेत्रों में नालों को गहरा करने, गाद निकालने, चेक डैम और सोख्ता गड्ढे बनाने, रिचार्ज शाफ्ट तैयार करने, कुओं की मरम्मत और उन्हें गहरा करने, कुओं के अधिग्रहण, नए बोरवेल की खुदाई और जल भंडारण क्षमता बढ़ाने को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया गया है।

इन जल संरक्षण कार्यों के लिए जिला योजना समिति (डीपीसी), कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड, जिला खनिज फाउंडेशन (डीएमएफ), जल जीवन मिशन, ग्राम पंचायतों और सिंचाई विभाग समेत विभिन्न माध्यमों से धन जुटाने को कहा गया है।

मंत्री ने ऐसे महत्वपूर्ण और बेहद संवेदनशील जल स्रोतों को प्राथमिकता देने को कहा, जिन्हें तत्काल मजबूत करने की जरूरत है।

इसके अलावा छत्रपति संभाजीनगर संभाग के शिरपुर पैटर्न और पुणे संभाग के सतारा जिले की जल संरक्षण पहल जैसे सफल मॉडल का दस्तावेज तैयार करने को कहा गया है, ताकि इन्हें महाराष्ट्र के दूसरे जिलों में भी लागू किया जा सके।

नासिक संभाग में संभावित जल संकट से निपटने के लिए मंत्री ने प्राकृतिक और कृत्रिम जल स्रोतों से पानी की अनधिकृत निकासी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने को कहा।

जिला कलेक्टरों को मौके पर जांच के लिए टीमें बनाने और अवैध कनेक्शन या बिना अनुमति पानी पंप करने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने को कहा गया है। मंत्री ने जोर देते हुए कहा कि “पानी की हर बूंद बचानी होगी।”

फील्ड अधिकारियों को सीधे गांवों का दौरा करने, स्थानीय समस्याओं की पहचान करने और उनके तत्काल समाधान के लिए जिला कलेक्टर या जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) को जानकारी देने के निर्देश दिए गए हैं।

सभी जिलों को 15 अक्टूबर तक जल संकट से निपटने की कार्ययोजना पूरी करनी होगी।

मंत्री ने कहा कि वर्षा के आंकड़े, भूजल स्तर, मौजूदा जल भंडारण, इस्तेमाल हो रहे टैंकरों और स्थानीय जल स्रोतों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए संवेदनशील गांवों के लिए अभी से योजना बनाई जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन को तीन अलग-अलग अवधि के लिए अलग कार्ययोजना तैयार करनी होगी। इनमें अक्टूबर से दिसंबर, जनवरी से मार्च और अप्रैल से जून की अवधि शामिल है। इसके लिए जरूरी धन, कर्मचारी और उपकरण पहले से उपलब्ध कराने होंगे।

जिला कलेक्टरों की अध्यक्षता में विभिन्न विभागों के बीच नियमित समन्वय बैठकें आयोजित करने का भी निर्देश दिया गया है। इन बैठकों में जलापूर्ति, कृषि, विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (पूर्ववर्ती मनरेगा), जल संरक्षण और जल संसाधन विभाग शामिल होंगे।

मंत्री पाटिल ने कहा कि उपलब्ध पानी का सही प्रबंधन केवल ग्राम पंचायतों की नहीं, बल्कि सभी प्रशासनिक संस्थाओं की सामूहिक जिम्मेदारी है।

जहां भी संभव हो, खेत तालाब बनाकर और मौजूदा जलाशयों से गाद निकालकर जल भंडारण क्षमता बढ़ाई जानी चाहिए।

बैठक में अलग-अलग क्षेत्रों के लिए विशेष उपायों पर भी चर्चा हुई। पुणे संभाग में जल स्रोतों को मजबूत करने और विशेष मरम्मत कार्य, सांगली में रिचार्ज शाफ्ट और गाद निकालने के प्रोजेक्ट, सोलापुर के संवेदनशील तालुकाओं के लिए अलग-अलग अवधि की योजना और सतारा की जल संरक्षण व्यवस्था को पूरे राज्य में अपनाने पर जोर दिया गया।

मंत्री पाटिल ने कहा, “जल संकट के समय नागरिकों को समय पर पानी उपलब्ध कराना हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। संकट गंभीर होने से पहले ही सभी जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए और उपलब्ध धन का प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जाना चाहिए।”