संयुक्त राष्ट्र, 24 जुलाई (आईएएनएस)। भारत ने कश्मीर मुद्दा उठाने के लिए ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) की आलोचना की है और इस मामले में उसके अधिकार पर सवाल उठाया है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने गुरुवार को कहा कि ऐसे अंतर-क्षेत्रीय (क्रॉस-रीजनल) समूह, जो न तो भौगोलिक आधार पर जुड़े हैं और न ही साझा मुद्दों पर आधारित हैं तथा जिनका अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से कोई सीधा संबंध नहीं है, उन्हें विवादों और संघर्षों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा, “ऐसे समूहों के पास विवादों के समाधान के लिए जरूरी क्षेत्रीय जानकारी और विषयगत विशेषज्ञता का अभाव होता है।”
हालांकि हरीश ने इस्लामिक सहयोग संगठन का नाम नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा स्पष्ट रूप से उसी संगठन की ओर था।
ओआईसी अपने विभिन्न मंचों पर कई बार जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठा चुका है। हाल ही में उसके महासचिवालय ने पिछले वर्ष अक्टूबर में भी इस विषय का उल्लेख किया था।
हरीश ने यह टिप्पणी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ‘विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के तंत्र को मजबूत करने’ विषय पर आयोजित खुली बहस के दौरान की, जहां पाकिस्तान ने एक बार फिर कश्मीर मुद्दा उठाया था।
हरीश ने कहा कि स्थापित क्षेत्रीय और उप-क्षेत्रीय संगठन विवादों और संघर्षों के समाधान में रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं और संयुक्त राष्ट्र के कार्यों के पूरक बन सकते हैं, लेकिन अंतर-क्षेत्रीय (क्रॉस-रीजनल) समूह इस भूमिका के लिए उपयुक्त नहीं हैं।
इससे पहले पाकिस्तान के संयुक्त राष्ट्र में स्थायी प्रतिनिधि आसिम इफ्तिखार अहमद ने दावा किया था कि कश्मीर विवाद दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा है।
57 सदस्य देशों वाला इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) चार महाद्वीपों में फैला हुआ है और उसका मुख्य उद्देश्य धार्मिक एकजुटता को बढ़ावा देना है। उसका अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से सीधा संबंध नहीं है, इसलिए कश्मीर जैसे क्षेत्रीय विवादों में उसकी भूमिका उपयुक्त नहीं मानी जा सकती।
पिछले साल अक्टूबर में जारी अपने बयान में ओआईसी महासचिवालय ने इस्लामिक शिखर सम्मेलन और विदेश मंत्रियों की बैठक जैसे विभिन्न मंचों के प्रस्तावों का उल्लेख करते हुए कहा था कि वह जम्मू-कश्मीर के लोगों के आत्मनिर्णय के वैध अधिकार की तलाश में उनके साथ अपनी पूर्ण एकजुटता दोहराता है।
इसमें कश्मीर पर सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों को लागू करने की भी मांग की गई, लेकिन 1948 में कश्मीर पर अपनाए गए मुख्य प्रस्ताव में मांग की गई थी कि पाकिस्तान कश्मीर के उन इलाकों से अपने सैनिकों और नागरिकों को हटा ले जिन पर उसका कब्जा है और वहां लड़ने वालों का समर्थन करना बंद कर दे।
पाकिस्तान ने इनमें से किसी का भी पालन नहीं किया और आतंकवाद का समर्थन करता रहा।

