Friday, June 12, 2026
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आरबीआई के ताजा फैसलों से भारत में आ सकता है 50 अरब डॉलर तक का फॉरेक्स इनफ्लो : रिपोर्ट

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नई दिल्ली, 12 जून (आईएएनएस)। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के ताजा कदमों से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार, बैंकिंग प्रणाली में तरलता और भारतीय रुपए को सपोर्ट मिलेगा। साथ ही, इससे वित्त वर्ष 27 में 40-50 अरब डॉलर का फॉरेक्स इनफ्लो देश में आ सकता है। यह जानकारी शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट में दी गई।

मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (एमओएफएसएल) की रिपोर्ट के अनुसार, आरबीआई के रियायती स्वैप फ्रेमवर्क के तहत ईसीबी रूट से उधार लेने की लागत में लगभग 200-250 आधार अंकों की कमी से बैंकों को फायदा हो सकता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि फंडिंग की कम लागत से क्रेडिट ग्रोथ को बढ़ावा मिलने, लोन की गतिविधियों के मजबूत होने और बैंकिंग सेक्टर में फंडिंग की क्षमता बेहतर होने की उम्मीद है।

यह नई पहल आरबीआई के 2013 में शुरू किए गए एक प्रोग्राम जैसी ही है, जिसके चलते एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट में लगभग 27 अरब डॉलर और कुल एनआरआई डिपॉजिट में करीब 34 अरब डॉलर का इनफ्लो हुआ था।

इसके अलावा, उस प्रोग्राम ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और करेंसी मार्केट में स्थिरता लाने में मदद की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट अभी बैंकिंग सिस्टम के कुल डिपॉजिट का सिर्फ 1.2 प्रतिशत है, जिससे पता चलता है कि इसमें विस्तार की काफी जगह है।

हालांकि, बैंकों ने एनआरआई ग्राहकों के लिए इन प्रोडक्ट्स को अधिक आकर्षक बनाने के लिए अलग-अलग मैच्योरिटी पीरियड पर एफसीएनआर (बी) डिपॉजिट की ब्याज दरें बढ़ानी शुरू कर दी हैं।

ब्रोकरेज का कहना है कि जिन बैंकों का कस्टमर बेस मजबूत है और जिनका विदेशी नेटवर्क पहले से स्थापित है, उन्हें सबसे अधिक फायदा होने और आने वाले फंड का बड़ा हिस्सा हासिल करने की संभावना है।

इसमें यह भी बताया गया है कि मौजूदा फ्रेमवर्क का स्ट्रक्चर जमाकर्ताओं और बैंकों, दोनों के लिए फायदेमंद है, जिससे अधिक भागीदारी को बढ़ावा मिलता है।

ब्रोकरेज के अनुसार, विदेशी मुद्रा का ज्यादा इनफ्लो, बेहतर लिक्विडिटी और ज्यादा रिजर्व बफर कुल मिलाकर करेंसी की स्थिरता को सपोर्ट कर सकते हैं और निवेशकों का भरोसा बढ़ा सकते हैं।

एमओएफएसएल का अनुमान है कि जैसे-जैसे इनफ्लो में तेजी आएगी, रुपया निकट भविष्य में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 93–94 की रेंज तक मजबूत हो सकता है।

इसके अलावा, एफसीएनआर (बी)-लिंक्ड फंडिंग से बैंकों को पारंपरिक होलसेल डिपॉजिट की तुलना में लगभग 60–65 आधार का स्प्रेड फायदा मिलता है, क्योंकि इसमें कैश रिजर्व रेश्यो (सीआरआर) और स्टैचुटरी लिक्विडिटी रेश्यो (एसएलआर) की जरूरतों से छूट मिलती है।

खास बात यह है कि सेंट्रल बैंक ने हाल ही में फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट [एफसीएनआर (बी)] डिपॉजिट और एक्सटर्नल कमर्शियल बॉरोइंग (ईसीबी) के लिए विशेष सुविधाएं शुरू की हैं, जिससे बैंक अपेक्षाकृत कम लागत पर विदेशी फंड जुटा सकते हैं।

इन उपायों का मकसद विदेशी पूंजी को आकर्षित करना, रिसोर्स जुटाने की क्षमता को बेहतर बनाना और बैंकिंग सिस्टम में कुल लिक्विडिटी की स्थिति को बेहतर करना है, खासकर ऐसे समय में जब ग्लोबल मार्केट में उतार-चढ़ाव और पूंजी के प्रवाह के ट्रेंड पर सबकी नजर है।