नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) वर्ष 2030 तक केवल बैक-ऑफिस या सपोर्ट इकाइयों की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक कंपनियों के लिए एआई-संचालित ‘एजेंटिक ट्रांसफॉर्मेशन इंजन’ बन सकते हैं। डेल टेक्नोलॉजीज और जिनोव की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में वही जीसीसी सफल होंगे, जो केवल एआई प्रयोगों तक सीमित रहने के बजाय डेटा, तकनीक और शासन से जुड़ी मजबूत नींव तैयार कर वास्तविक कारोबारी परिणाम देने पर ध्यान देंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, 70 प्रतिशत जीसीसी नेताओं के पास पहले से एआई से जुड़ा स्पष्ट रोडमैप या चार्टर मौजूद है। भारत के जीसीसी वैश्विक एआई प्रतिभा का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं और देश में 1,200 से अधिक जीसीसी केंद्र एआई तथा मशीन लर्निंग क्षमताएं विकसित कर चुके हैं।
डेल टेक्नोलॉजीज इंडिया के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मनीष गुप्ता ने कहा कि जैसे-जैसे जीसीसी अधिक रणनीतिक जिम्मेदारियां संभालेंगे, डेटा, इंफ्रास्ट्रक्चर और गवर्नेंस जैसी मजबूत बुनियादी क्षमताएं नवाचार का आधार बनेंगी। उनका कहना है कि जो जीसीसी अभी से इन क्षेत्रों में निवेश करेंगे, वे तय करेंगे कि वैश्विक कंपनियां एआई का उपयोग किस प्रकार करेंगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्तमान में 2,100 से अधिक जीसीसी कार्यरत हैं, जो लगभग 23.6 लाख लोगों को रोजगार देते हैं और वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 98.4 अरब डॉलर का राजस्व उत्पन्न कर चुके हैं।
जिनोव के अध्यक्ष सिद्धांत रस्तोगी ने कहा कि पिछले दो दशकों में जीसीसी की चर्चा मुख्य रूप से पैमाने, प्रतिभा और क्षमताओं को लेकर होती थी, लेकिन अब अगला दशक ‘स्वामित्व और नेतृत्व’ का होगा।
रस्तोगी ने कहा कि एआई और एजेंटिक सिस्टम्स के व्यवसायिक प्रक्रियाओं में शामिल होने के साथ जीसीसी से केवल सेवाएं देने की नहीं, बल्कि उत्पादों, प्लेटफॉर्म्स, बाजारों और कारोबारिक परिणामों की जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा की जाएगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 64 प्रतिशत जीसीसी नेता पहले से दोहरी वैश्विक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। वे न केवल भारत स्थित केंद्रों का संचालन कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर किसी महत्वपूर्ण कारोबारी कार्य का नेतृत्व भी कर रहे हैं।
एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि 66 प्रतिशत जीसीसी नेता अपनी एआई रणनीति में राजस्व और कारोबारी प्रभाव को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि एआई की चर्चा अब केवल लागत कम करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यवसायिक विकास और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त से जुड़ चुकी है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि एआई-आधारित एजेंटिक वर्कफ्लो पारंपरिक चैट-आधारित एआई सिस्टम्स की तुलना में कहीं अधिक कंप्यूटिंग संसाधनों की मांग करते हैं। जहां एक सामान्य चैट इंटरैक्शन में लगभग 1,000 से 2,000 टोकन्स की आवश्यकता होती है, वहीं एजेंटिक वर्कफ्लो में 10,000 से 5 लाख टोकन्स तक की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए समय रहते सही इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश करना बेहद जरूरी होगा।
अध्ययन में यह भी अनुमान लगाया गया है कि जीसीसी में होने वाले 55 प्रतिशत नियमित कार्य एआई आधारित ऑटोमेशन के दायरे में आ सकते हैं, जबकि वर्ष 2030 तक लगभग 60 प्रतिशत कार्यबल को नए कौशल सीखने (रिस्किलिंग) की आवश्यकता होगी, इसलिए अनिवार्यता एआई प्रशिक्षण में वृद्धि करने की नहीं, बल्कि कार्य की मौलिक रूप से पुनर्कल्पना करने की है।
