मुंबई, 23 जुलाई (आईएएनएस)। प्रस्तावित आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) से पहले जूनिपर ग्रीन एनर्जी लिमिटेड ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के पास दाखिल अपने ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (डीआरएचपी) में एडेंडम जोड़कर कंपनी, उसकी सहायक कंपनियों, प्रमोटरों, निदेशकों और प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों से जुड़े लंबित मुकदमों की जानकारी साझा की है।
डीआरएचपी के अनुसार, कंपनी पर 10.44 करोड़ रुपए (104.40 मिलियन रुपए) का एक महत्वपूर्ण सिविल मुकदमा लंबित है। वहीं, उसकी सहायक कंपनियां 74.90 करोड़ रुपए (749 मिलियन रुपए से अधिक) से जुड़े आपराधिक और सिविल मामलों का सामना कर रही हैं। इसके अलावा कंपनी के खिलाफ कुल 37.1 लाख रुपए (3.71 मिलियन रुपए) से जुड़े 6 टैक्स मामले भी लंबित हैं।
दस्तावेज के मुताबिक, कंपनी की सहायक कंपनियों पर कानूनी मामलों का बोझ अधिक है। सहायक कंपनियों के खिलाफ दो आपराधिक मामले और 70.72 करोड़ रुपए (707.19 मिलियन रुपए) के दो महत्वपूर्ण सिविल मुकदमे लंबित हैं।
इसके अतिरिक्त, एक आपराधिक मामला, एक वैधानिक या नियामकीय कार्रवाई और दो अन्य महत्वपूर्ण सिविल मुकदमे भी हैं, जिनकी कुल राशि 4.23 करोड़ रुपए (42.29 मिलियन रुपए) है।
डीआरएचपी में कंपनी के प्रमोटरों, निदेशकों और प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों से जुड़े कानूनी मामलों का भी खुलासा किया गया है।
कंपनी ने कहा है कि वह और उसकी सहायक कंपनियां सामान्य कारोबारी गतिविधियों के दौरान उत्पन्न होने वाले विभिन्न कानूनी विवादों, दावों और मुकदमों में शामिल हैं। ये मामले अलग-अलग अदालतों, न्यायाधिकरणों और वैधानिक प्राधिकरणों के समक्ष लंबित हैं।
कंपनी ने अपने डीआरएचपी में कहा कि उसके नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं से जुड़े परमिट को चुनौती देने के लिए व्यक्ति या हित समूह मुकदमे दायर कर सकते हैं। दस्तावेज के अनुसार, कंपनी के प्रमोटरों के खिलाफ 19.5 लाख रुपए (1.95 मिलियन रुपए) का एक आपराधिक मामला लंबित है। वहीं, एक निदेशक द्वारा शुरू किया गया एक आपराधिक मामला और एक अन्य निदेशक के खिलाफ भी 19.5 लाख रुपए का आपराधिक मामला लंबित है।
कंपनी के प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों द्वारा शुरू किए गए दो आपराधिक मामलों का भी डीआरएचपी में उल्लेख किया गया है, हालांकि इनमें किसी वित्तीय राशि का उल्लेख नहीं किया गया है।
जूनिपर ग्रीन एनर्जी ने चेतावनी दी है कि यदि इन मामलों में प्रतिकूल फैसला आता है, भारी हर्जाना देना पड़ता है, अदालत से रोक लगाने का आदेश मिलता है या परियोजनाओं के परमिट रद्द या अस्वीकार कर दिए जाते हैं, तो इसका कंपनी के कारोबार, नकदी प्रवाह, वित्तीय स्थिति और परिचालन परिणामों पर महत्वपूर्ण प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
कंपनी ने यह भी कहा कि इन मामलों के समझौते भी उसके वित्तीय प्रदर्शन को प्रभावित कर सकते हैं।

