Monday, July 27, 2026
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भीषण गर्मी और कूलिंग संसाधनों की कमी से कई देशों में मृत्यु दर बढ़ने का अनुमान: रिपोर्ट

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नई दिल्ली, 27 जुलाई (आईएएनएस)। जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से वर्ष 2050 तक हर साल करीब 4.3 लाख अतिरिक्त लोगों की मौत होने का अनुमान है। इनमें से लगभग 10 गुना अधिक मौत गरीब देशों में होंगी, जबकि अमीर देशों में यह संख्या काफी कम रहेगी।

सोमवार को जारी ‘क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब’ की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, इन मौतों को काफी हद तक रोका जा सकता है, लेकिन इसके लिए लोगों को ऊर्जा, खासकर ‘कूलिंग (ठंडक) के लिए जरूरी बिजली’ तक पहुंच मिलनी चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन इलाकों पर भीषण गर्मी का सबसे ज्यादा असर पड़ेगा, वहीं के लोगों के पास एयर कंडीशनिंग जैसी सुविधाएं चलाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं होंगे।

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के सह-संस्थापक और शिकागो विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर ‘माइकल ग्रीनस्टोन’ ने कहा, “एयर कंडीशनर लोगों की जान बचा सकता है, और जलवायु परिवर्तन के कारण अमीर देशों में इसका इस्तेमाल निश्चित रूप से बढ़ेगा। लेकिन हमारी रिसर्च बताती है कि दुनिया के कई गरीब देशों के लोग ऐसा नहीं कर पाएंगे। यही जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है कि सबसे ज्यादा मौतें उन्हीं देशों में होंगी, जिन्होंने जलवायु परिवर्तन में सबसे कम योगदान दिया है।”

उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट उन देशों के लिए चेतावनी है, जहां अभी भी बिजली व्यवस्था को सस्ती और भरोसेमंद बनाने के लिए तेजी से काम करने की जरूरत है। साथ ही ऐसे दूसरे उपाय भी तलाशने होंगे, जो लोगों की जान बचा सकें।

रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल दुनिया के केवल सबसे अमीर देशों के पास ही इतनी क्षमता है कि वे बड़े पैमाने पर कूलिंग के लिए बिजली का इस्तेमाल कर सकें। हालांकि, जैसे-जैसे दुनिया का तापमान बढ़ेगा, कई मध्यम आय वाले देशों की अर्थव्यवस्था और बिजली व्यवस्था इतनी मजबूत हो जाएगी कि वहां बिजली की खपत और कूलिंग सुविधाओं का इस्तेमाल बढ़ सकेगा।

अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण ‘मध्यम आय वाले देशों में कूलिंग के लिए बिजली की खपत कम आय वाले देशों की तुलना में सात गुना अधिक बढ़ेगी।’ वहीं कम आय वाले देशों में प्रति व्यक्ति बिजली की अतिरिक्त खपत इतनी कम होगी कि उससे केवल एक एलईडी बल्ब को चार महीने तक ही जलाया जा सकेगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन गरीब देशों में बिजली की उपलब्धता सबसे कम बढ़ने का अनुमान है, वही देश पहले से ही सबसे अधिक गर्म क्षेत्रों में आते हैं। रिपोर्ट ने 18 देशों के ऐसे इलाकों की पहचान की है, जहां लगभग 67.6 करोड़ लोग रहते हैं और वे भीषण गर्मी तथा कूलिंग की कमी दोनों समस्याओं का एक साथ सामना करेंगे।

इन क्षेत्रों में बढ़ते तापमान और बिजली की सीमित उपलब्धता के कारण वर्ष 2050 तक हर साल करीब 3.77 लाख लोगों की मौत होने का अनुमान है। ये सभी लोग वर्तमान में कम आय या निम्न-मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। इनमें सबसे अधिक प्रभावित देश उत्तरी उप-सहारा अफ्रीका के नाइजर, माली, बुर्किना फासो और चाड हैं।

इसके अलावा दक्षिण एशिया के पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार भी इस सूची में शामिल हैं।

रिपोर्ट में इन देशों की तुलना उनके समृद्ध पड़ोसी देशों से की गई है। उदाहरण के तौर पर बहरीन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों में भी तापमान उप-सहारा अफ्रीका जितना ही रहता है, लेकिन वहां कूलिंग के लिए बिजली की खपत कहीं अधिक है और भविष्य में इसके और बढ़ने की संभावना है। इसी वजह से वहां गर्मी से होने वाली मौतों की संख्या अपेक्षाकृत कम रहने का अनुमान है।

रिपोर्ट में नाइजर और सऊदी अरब का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि वर्ष 2050 तक नाइजर में प्रति व्यक्ति बिजली की अतिरिक्त खपत, सऊदी अरब की तुलना में केवल नौवें हिस्से के बराबर होगी। इसके चलते नाइजर में हर साल करीब 27,000 अधिक लोगों की मौत गर्मी के कारण होने का अनुमान है।

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब के फेलो और शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (ईपीआईसी) में वैज्ञानिक अनुसंधान निदेशक अश्विन रोडे ने कहा, “हमने उन इलाकों की पहचान की है, जहां गर्मी से सबसे ज्यादा मौतें होने का खतरा है और जहां लोगों के पास एयर कंडीशनर चलाने के लिए पर्याप्त बिजली भी नहीं होगी। इससे सरकारों और नीति-निर्माताओं को यह तय करने में मदद मिलेगी कि सबसे अधिक लोगों की जान कैसे बचाई जा सकती है।”

उन्होंने कहा कि लोगों को भीषण गर्मी से बचाने के लिए बिजली की बेहतर उपलब्धता, हीट अर्ली वार्निंग सिस्टम, प्रभावी कार्ययोजनाएं, स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार और जरूरतमंद लोगों के लिए लक्षित सामाजिक योजनाएं जैसी पहल जरूरी होंगी। हालांकि, फिलहाल इन उपायों में से कई का बड़े पैमाने पर परीक्षण नहीं हुआ है और संस्था इस दिशा में काम कर रही है।

क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब दुनिया भर के देशों के लिए डेटा आधारित रणनीतियां और प्रभावी अनुकूलन उपायों (एडाप्टेशन स्ट्रैटेजीज) का एक वैश्विक खाका तैयार कर रही है, ताकि सरकारें, वित्तीय संस्थान और स्थानीय समुदाय जलवायु परिवर्तन से बढ़ते जोखिमों का बेहतर तरीके से सामना कर सकें।