नई दिल्ली, 26 अगस्त (आईएएनएस)। भारत ने बुधवार को संयुक्त राष्ट्र की नस्लीय भेदभाव उन्मूलन कमेटी (सीईआरडी) की देश के बारे में की गई टिप्पणियों को सिरे से खारिज कर दिया। भारत ने इसे “राजनीति से प्रेरित” और “बेहद दुर्भावनापूर्ण” बताया।
विदेश मंत्रालय (एमईए) ने एक बयान में कहा कि उसने 11-12 अगस्त को जिनेवा में आईसीईआरडी के तहत भारत की 11वीं आवधिक (सामायिक) समीक्षा के बाद ‘नस्लीय भेदभाव उन्मूलन कमेटी’ के बयान पर गौर किया।
एमईए ने कहा कि यह एक सामान्य संधि-निकाय समीक्षा थी और भारत ने रचनात्मक जुड़ाव की भावना के साथ इसमें हिस्सा लिया। मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया कि नस्लीय भेदभाव से निपटने के लिए भारत की प्रतिबद्धता अटूट है।
समीक्षा के दौरान भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने देश की बहुलता, विविधता और विशाल सामाजिक जटिलता को रेखांकित करते हुए मानवाधिकार और समानता सुनिश्चित करने के लिए किए जा रहे प्रयासों को सामने रखा।
भारत की ओर से यह भी कहा गया कि देश सभी नागरिकों के लिए समानता, गरिमा और अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है। भारत ने इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया।
एमईए ने एक बयान में कहा, “हालांकि हम स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से समिति की टिप्पणियों का जवाब देंगे, लेकिन भारत के सॉलिसिटर जनरल श्री तुषार मेहता के नेतृत्व वाले अंतर-मंत्रालयी प्रतिनिधिमंडल ने समीक्षा बैठक के दौरान ही व्यापक सामान्यीकरण, निराधार आरोपों या कन्वेंशन के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाने की प्रवृत्ति को खारिज कर दिया था।”
मंत्रालय ने आगे कहा, “भारत रिपोर्ट में की गई किसी भी राजनीति से प्रेरित और बेहद दुर्भावनापूर्ण टिप्पणी को पूरी तरह से खारिज करता है और इसकी कड़ी निंदा करता है।”
एमईए का यह बयान तब आया है जब ‘नस्लीय भेदभाव खत्म करने वाली संयुक्त राष्ट्र समिति’ ने कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा जातीय और जातीय-धार्मिक समूहों, मूल निवासियों और आदिवासी लोगों (जिनमें अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति (विशेषकर दलित और नॉन सिटीजन शामिल हैं) के खिलाफ “बड़े पैमाने पर उल्लंघनों” की खबरों पर चिंता व्यक्त की।
‘नस्लीय भेदभाव खत्म करने वाली समिति’ (सीईआरडी) स्वतंत्र विशेषज्ञों का एक निकाय है जो सदस्य देशों द्वारा ‘सभी प्रकार के नस्लीय भेदभाव को खत्म करने के कन्वेंशन’ के कार्यान्वयन की निगरानी करता है।
11-12 अगस्त को हुई इस नवीनतम समीक्षा में 2023 में सीईआरडी को सौंपी गई भारत की 12वीं और 21वीं संयुक्त आवधिक रिपोर्ट्स पर चर्चा की गई। जिनेवा में भारत के स्थायी मिशन के बयान के अनुसार, चर्चा में आईसीईआरडी को लागू करने के लिए संस्थागत ढांचे, वंचित समूहों द्वारा की गई प्रगति और पूर्वाग्रह व असहिष्णुता से निपटने के उपायों सहित कई मुद्दों को शामिल किया गया।
बयान में कहा गया, “भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने हमारे बहुलवाद, विविधता, बड़े पैमाने और जटिलता, संवैधानिक और कानूनी ढांचे व सुरक्षा उपायों, सकारात्मक कदमों, लोकतांत्रिक जवाबदेही, न्यायिक उपायों, लक्षित सार्वजनिक नीति और निरंतर सामाजिक-आर्थिक विकास पर प्रकाश डाला। देश सभी नागरिकों के लिए समानता, गरिमा और अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।”
इस समीक्षा से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार ढांचे के साथ जुड़ने और साथ ही अपने सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की सुरक्षा और उन्हें बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास जारी रखने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का पता चला। भारत 1960 के दशक में आईसीईआरडी बातचीत और मसौदा तैयार करने में सक्रिय रूप से शामिल था; यह वह समय था जब विकासशील देश उपनिवेशवाद, रंगभेद और नस्लीय भेदभाव का सामना कर रहे थे।
