Sunday, May 24, 2026
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पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के साथ ज्यादती बेइंतहा, ईद पर नहीं पढ़ने दी गई नमाज : मानवाधिकार संगठन

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इस्लामाबाद, 30 मार्च (आईएएनएस)। पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में एक बार फिर अहमदिया समुदाय को धार्मिक स्वतंत्रता से वंचित किए जाने के आरोप सामने आए हैं। जो अवसर पूरे समाज को एकजुट करने का होना चाहिए था, वह कथित तौर पर भेदभाव और बहिष्कार की एक और मिसाल बनकर रह गया।

अल्पसंख्यक अधिकार संगठन वॉइस ऑफ पाकिस्तान माइनॉरिटी (वीओपीएम) की रिपोर्ट के मुताबिक, ईद के मौके पर कई इलाकों में पुलिस की भारी तैनाती, प्रशासनिक रुकावटें और कानूनी कार्रवाई के डर ने अहमदिया समुदाय के लोगों को खुलकर इबादत करने से रोक दिया। कई स्थानों पर धार्मिक सभाएं या तो बाधित कर दी गईं या शुरू ही नहीं हो सकीं।

रिपोर्ट में कहा गया, “यह कोई एकबारगी घटना नहीं है, बल्कि साल-दर-साल दोहराया जाने वाला एक पैटर्न है। हर वर्ष अहमदिया समुदाय को समान तरह की पाबंदियों, दबावों और संदेशों का सामना करना पड़ता है—कि सार्वजनिक धार्मिक जीवन में उनकी भागीदारी स्वीकार्य नहीं है।”

वीओपीएम ने इस स्थिति के लिए पाकिस्तान के कानूनी ढांचे को जिम्मेदार ठहराया है, जिसमें अहमदिया समुदाय की धार्मिक गतिविधियों पर औपचारिक रूप से प्रतिबंध लगाए गए हैं। समय के साथ ये कानून न केवल नीतियों को प्रभावित करते हैं, बल्कि समाज के नजरिए को भी आकार देते हैं, जिससे भेदभाव सामान्य होता जा रहा है और स्थानीय प्रशासन बिना किसी विरोध के ऐसे कदम उठाता रहता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियां, जिनका काम नागरिकों की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा करना है, कई मामलों में खुद पाबंदियों का साधन बन जाती हैं। शांतिपूर्ण इबादत में बार-बार हस्तक्षेप न केवल समुदाय को अलग-थलग करता है, बल्कि जवाबदेही और कानून के शासन पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

अहमदिया समुदाय के लिए इसका असर सिर्फ एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। ईद जैसे पर्व, जो एकता, आस्था और खुशी का प्रतीक होते हैं, उनके लिए असमानता और अलगाव की याद दिलाने वाले बन जाते हैं। हर साल खुले तौर पर त्योहार मनाने से वंचित रहना उनके भीतर अलगाव की भावना को और गहरा करता है।

रिपोर्ट में यह विरोधाभास भी उजागर किया गया है कि एक ओर पाकिस्तान धार्मिक स्वतंत्रता और उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई की बात करता है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों से मेल नहीं खाती। वीओपीएम का कहना है कि जब तक इस दोहराए जा रहे पैटर्न को खत्म नहीं किया जाता, तब तक समान अधिकारों का वादा अधूरा ही रहेगा और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव जारी रहेगा।