नई दिल्ली, 8 जून (आईएएनएस)। पश्चिम बंगाल में तीन दशक लंबे वाम मोर्चा शासन का अंत करने वाली तृणमूल कांग्रेस आज गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रही है। पार्टी की स्थिति अब उस घर जैसी बताई जा रही है, जो रेत की नींव पर बना हो और तूफान आते ही ढहने लगे।
विधानसभा चुनाव में हार के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों, गुटबाजी और संगठनात्मक कमजोरी से जूझ रही तृणमूल कांग्रेस में अब खुली बगावत सामने आ गई है। पार्टी के 80 निर्वाचित विधायकों में से 58 विधायकों के एक धड़े ने खुद को विधानसभा में “असली तृणमूल कांग्रेस” के रूप में मान्यता देने की मांग की है। इसके करीब पांच दिन बाद पार्टी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने भी लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय में इसी तरह का दावा पेश किए जाने की खबर है।
पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से एक, बशीरहाट सीट, तृणमूल सांसद के निधन के बाद फिलहाल रिक्त है।
इस बीच, पार्टी के 13 राज्यसभा सांसदों में शामिल सुखेंदु शेखर रॉय ने सोमवार को राज्यसभा सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी। उनका कार्यकाल वर्ष 2029 तक था।
77 वर्षीय राय पहले से ही पार्टी नेतृत्व के निशाने पर थे। उन्होंने अगस्त 2024 में आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में प्रशिक्षु डॉक्टर के दुष्कर्म और हत्या मामले में न्याय की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों का खुलकर समर्थन किया था। उस समय राज्य सरकार की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे थे। विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों पर भी पार्टी नेतृत्व की सार्वजनिक आलोचना की थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी अब पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं और संगठन से पहले की तुलना में अधिक दूर नजर आ रही हैं। वहीं, संगठन की जिम्मेदारी संभाल रहे उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी पर पेशेवर सलाहकारों पर अत्यधिक निर्भर रहने का आरोप लगाया जा रहा है, जिनकी रणनीतियां अक्सर बंगाल की राजनीतिक संस्कृति से मेल नहीं खातीं।
पार्टी के भीतर लंबे समय से असंतोष पनप रहा था। कई नेताओं को लग रहा था कि उन्हें दरकिनार किया जा रहा है या उन पर दबाव बनाया जा रहा है। मौजूदा घटनाक्रम की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में हुई टूट से की जा रही है, जहां अलग हुए गुटों ने खुद को “असली पार्टी” के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी।
राज्य में संदेशखाली विवाद, आरजी कर मेडिकल कॉलेज मामला, भ्रष्टाचार के आरोप और हालिया हस्ताक्षर विवाद जैसे घटनाक्रमों ने पार्टी की साख को लगातार नुकसान पहुंचाया है।
ऋतब्रत बनर्जी ने कोलकाता में बागी विधायकों का नेतृत्व किया, जबकि नई दिल्ली में सांसदों के असंतुष्ट गुट को कथित तौर पर काकोली घोष दस्तीदार ने संगठित किया।
66 वर्षीय चिकित्सक और सांसद काकोली घोष दस्तिदार पार्टी नेतृत्व से नाराज बताई जा रही हैं। उन्हें पार्टी के मुख्य सचेतक (चीफ व्हिप) पद से हटाया गया था, जिसके बाद उन्होंने संगठन के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। खबर है कि उन्होंने बागी सांसदों की सूची लोकसभा अध्यक्ष को सौंपते हुए उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) समर्थित अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की है।
सूत्रों के अनुसार, उनका मानना है कि उन्हें चीफ व्हिप पद से हटाने की आधिकारिक सूचना अभी तक लोकसभा अध्यक्ष कार्यालय को नहीं मिली है, इसलिए तकनीकी रूप से वह अभी भी इस पद पर बनी हुई हैं।
अंतिम फैसला चुनाव आयोग और संसद व विधानसभा के संबंधित पीठासीन अधिकारियों को करना है, लेकिन 28 वर्ष पहले ममता बनर्जी द्वारा स्थापित तृणमूल कांग्रेस फिलहाल गहरे संगठनात्मक संकट में घिरी दिखाई दे रही है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जिस तरह वाम मोर्चा सरकार भ्रष्टाचार, अहंकार और जनता से दूरी के आरोपों के कारण 34 वर्षों के शासन के बाद सत्ता से बाहर हुई थी, उसी तरह तृणमूल कांग्रेस भी अब वैसी ही चुनौतियों का सामना करती दिख रही है।
आलोचकों का आरोप है कि कभी “दीदी” की जननेता वाली छवि के दम पर उभरी ममता बनर्जी की पार्टी अब भ्रष्टाचार के आरोपों, विवादित नेताओं और संगठनात्मक अव्यवस्था से घिर गई है। उनका मानना है कि पार्टी की विश्वसनीयता कमजोर पड़ रही है और उसकी राजनीतिक नींव में दरारें साफ दिखाई देने लगी हैं।

