चेन्नई, 8 नवंबर (आईएएनएस)। तमिलनाडु के इरोड जिले में वेलोड पक्षी अभयारण्य के आसपास के 10 से अधिक गांवों के निवासियों ने वन्यजीव संरक्षण की एक मिसाल पेश करते हुए रविवार को बिना पटाखे जलाए दीपावली मनाई। इस तरह उन्होंने लगातार 21वें साल अपनी इस शानदार परंपरा को कायम रखा।
ग्रामीणों ने स्वेच्छा से इस परंपरा को अपनाया है, ताकि यहां रहने वाले और बाहर से आने वाले हजारों पक्षियों को पटाखों के तेज शोर और उनसे होने वाले वायु प्रदूषण से बचाया जा सके।
उनके इस सामूहिक संकल्प ने इस त्योहार को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी निभाने के एक वार्षिक आयोजन में बदल दिया है। इस पहल को बनाए रखने में बच्चों ने भी अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने खुशी-खुशी शोर करने वाले पटाखों को छोड़ दिया और अपना जश्न केवल फुलझड़ियों तक ही सीमित रखा।
लोगों ने नए कपड़े पहनकर, एक-दूसरे को बधाई देकर और पारंपरिक उत्सवों में हिस्सा लेकर त्योहार मनाया और इस दौरान अभयारण्य के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को कोई नुकसान नहीं पहुंचने दिया।
इरोड शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित वेलोड पक्षी अभयारण्य लगभग 240 एकड़ में फैला है और लंबे समय से कई प्रजातियों के पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण आवास रहा है।
केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्रालय द्वारा 1996 में स्थापित यह अभयारण्य, तमिलनाडु के संरक्षित क्षेत्रों की आधिकारिक सूची में शामिल 16 पक्षी अभयारण्यों में से एक है।
राज्य के कई अन्य पक्षी अभयारण्यों के विपरीत वेलोड के आसपास कोई जंगल नहीं है। इसके बजाय इसका पारिस्थितिक महत्व ‘पेरियाकुलम झील’ (टैंक) पर केंद्रित है, जो भारत के विभिन्न हिस्सों और विदेशों से आने वाले पक्षियों को भोजन, घोंसला बनाने और प्रजनन के लिए जगह प्रदान करती है।
इस अभयारण्य में आमतौर पर मार्च से अक्टूबर के बीच पक्षियों के घोंसला बनाने और प्रजनन के मौसम में उनका आना-जाना लगा रहता है, हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि अभी यहां पक्षियों की संख्या काफी कम है और केवल कुछ ही स्थानीय और प्रवासी प्रजातियां देखी गई हैं।
पिछले कुछ वर्षों में यह अभयारण्य हजारों पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है, जिनमें कई प्रवासी प्रजातियां भी शामिल हैं।
यहां देखे गए पक्षियों में बार-हेडेड गूज (पहाड़ी हंस), ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, यूरेशियन स्पूनबिल, स्पॉट-बिल्ड पेलिकन, वेस्टर्न मार्श हैरियर और ब्लू-टेल्ड बी-ईटर जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि पटाखों का इस्तेमाल न करने का फैसला अब एक स्थापित सामुदायिक परंपरा बन गई है, जिसमें नई पीढ़ी भी संरक्षण के इस प्रयास का पूरा समर्थन कर रही है। कुछ परिवार, जो पटाखे जलाना चाहते थे, उन्होंने अपने गांवों में पक्षियों को परेशान करने के बजाय अभयारण्य के आसपास के क्षेत्र से बाहर अपने रिश्तेदारों के घरों में जाकर पटाखे जलाए।
21 वर्षों से लगातार चल रही यह पहल दिखाती है कि कैसे स्थानीय समुदाय स्वेच्छा से वन्यजीव संरक्षण में योगदान दे सकते हैं। इससे यह भी साबित होता है कि पारंपरिक उत्सव और पर्यावरण संरक्षण, दोनों एक साथ चल सकते हैं और इसके लिए त्योहार के उत्साह से कोई समझौता करने की जरूरत नहीं है।
