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आईआईटी बॉम्बे छात्र की मौत: राज ठाकरे ने जातिगत राजनीति से मुख्य मुद्दों को कमजोर करने के खिलाफ चेताया

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मुंबई, 23 सितंबर (आईएएनएस)। आईआईटी बॉम्बे में पढ़ाई कर रहे छात्र साहिल वाकोडे ने 18 सितंबर को फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना के बाद से काफी हलचल मची हुई है। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने बुधवार को 20 वर्षीय साहिल वाकोडे की मौत पर गहरा दुख जताते हुए हर दुखद घटना को जाति और धर्म के नज़रिए से देखने की बढ़ती प्रवृत्ति की आलोचना की। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह का ध्रुवीकरण भारत की शिक्षा प्रणाली की गहरी कमियों से ध्यान भटकाता है।

राज ठाकरे ने एक्स पोस्ट में कहा, “आईआईटी बॉम्बे में एक बेहद दुखद घटना हुई, जिसमें 20 साल के छात्र साहिल वाकोडे ने अपनी जान दे दी। आईआईटी प्रशासन ने शुरू में आरोप लगाया था कि उसने परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन और चैटजीपीटी का इस्तेमाल किया था। बाद में प्रशासन ने माफी मांगी और माना कि जांच पूरी होने से पहले इस आरोप को सार्वजनिक करना गलत था। वहीं, साहिल के परिवार ने जाति-आधारित उत्पीड़न का आरोप लगाया है, इन आरोपों के संबंध में मामला दर्ज किया गया है और जांच चल रही है। संबंधित प्रोफेसरों ने भी अपना पक्ष रखा है। इन सबके बीच, एक युवा ने अपनी जान गंवा दी, लेकिन ऐसा लगता है कि कोई भी इस बात पर चर्चा नहीं कर रहा है कि उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा।”

राज ठाकरे ने कहा, “अगर कोई छात्र परीक्षा के दौरान गलत काम करता है, तो प्रोफेसर का यह फर्ज है कि वे उसे रोकें और नियमों के अनुसार कार्रवाई करें। लेकिन, आरोप साबित होने से पहले ही किसी गुजर चुके छात्र को दोषी ठहराना सही नहीं है। इसी तरह, सिर्फ जाति-आधारित उत्पीड़न का आरोप लगने पर बिना जांच पूरी हुए प्रोफ़ेसरों को दोषी मान लेना भी गलत है। फिर भी, इन बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इन मामलों में ‘जाति’ के मुद्दे को सबसे आगे रखने की वजह से कोई भी इस बात पर चर्चा या विचार नहीं करना चाहता कि एक ही घटना के बाद बीस साल के उस युवक को ऐसा क्यों लगा होगा कि उसकी ज़िंदगी के सारे रास्ते बंद हो गए हैं।”

ठाकरे ने कहा, “मैंने अक्सर अपने भाषणों में कहा है कि साल 2000 के बाद से महाराष्ट्र में जातिवाद इतना बढ़ गया है कि लोग क्लास में अपने बच्चे के बगल में बैठे छात्र की जाति जानने लगे हैं और ऑफिस में सालों तक साथ खाना खाने वाले सहकर्मी भी एक-दूसरे को जाति के नजरिए से देखने लगे हैं। यह जहर इतना फैल चुका है कि अब आईआईटी तक पहुंच गया है। यह सचमुच दुखद है कि उन्हीं आईआईटी में, जिन्हें पंडित नेहरू ने “आधुनिक भारत का मंदिर” कहा था। एक छात्र ने आत्महत्या कर ली और इस दुखद घटना के पीछे जाति का मुद्दा होने की बात सामने आई है, जिससे यह साधारण लेकिन दिल तोड़ने वाली सच्चाई दब गई है कि हमने एक इंसान को खो दिया है।”

राज ठाकरे ने कहा, “असल में, चाहे आईआईटी का एंट्रेंस हो या उससे पहले का कोई कॉम्पिटिटिव एग्जाम, मुकाबला बहुत कड़ा हो गया है। लाखों स्टूडेंट्स कुछ सौ सीटों के लिए होड़ करते हैं। चुने जाने के बाद उन पर पढ़ाई का भारी बोझ होता है और फिर कैंपस प्लेसमेंट की चिंता सताती है। इसके अलावा, आईआईटी हो या आईआईएम कैंपस प्लेसमेंट से अब वैसी मोटी सैलरी की गारंटी नहीं मिलती, जैसी पहले मिलती थी। निराशा का यह भाव सिर्फ आईआईटी स्टूडेंट्स तक ही सीमित नहीं है, यह हर जगह फैला हुआ है और कॉमर्स व आर्ट्स के स्टूडेंट्स से लेकर डॉक्टर और इंजीनियर तक, सभी पर असर डालता है। इसी निराशा के बीच साहिल ने अपनी जान दे दी। इससे एक अहम सवाल उठता है, क्या हमें उस एजुकेशन सिस्टम को चुनौती देनी चाहिए और उसमें सुधार करना चाहिए जो पूरी तरह से चरमरा चुका है, या फिर हमें उस स्टूडेंट की जाति पर ध्यान देना चाहिए जिसने आत्महत्या की और उस व्यक्ति की जाति पर जिसने उससे सवाल पूछा?”

ठाकरे ने एक्स पोस्ट पर लिखा, “सवाल यह नहीं है कि सत्ता में कौन सी सरकार है। पिछले 30-40 सालों में, शिक्षा के व्यवसायीकरण की होड़ में हमने पूरे भारतीय शिक्षा तंत्र को बहुत नुकसान पहुंचाया है, इसे ठीक करने के लिए बड़े बदलावों की ज़रूरत है। अभी हाल ही में ऐसा लगा था कि ‘जेन जी’ आंदोलन से ऐसे बदलाव की शुरुआत हो रही है, तभी यह नई घटना सामने आ गई। मैं छात्रों से कहना चाहता हूं कि वे याद रखें कि उनके आंदोलन को देश भर से समर्थन इसलिए मिला, क्योंकि यह व्यवस्था की कमियों को दूर करने के समाधान खोजने पर केंद्रित था। आपके आंदोलन को इसी रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए। अगर ऐसा होता है, तो सरकार मुश्किल सवालों के जवाब देने और ठोस कदम उठाने के लिए मजबूर होगी। क्या सरकार ऐसा करना चाहती है? अगर हां, तो यह बहुत अच्छी बात है, अगर नहीं, तो उनके पास जाति और धर्म जैसे असरदार हथियार हमेशा मौजूद रहते हैं। एक बार जब जाति और धर्म के मुद्दे बीच में आ जाते हैं, तो बातचीत को भटकाना आसान हो जाता है। ऐसी भटकाने वाली बातों में न फंसें।”