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जम्मू-कश्मीरः पहली बार नचलाना तालाब गांव तक पहुंचेगी सड़क, निर्माण कार्य शुरू

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बनिहाल, 8 सितंबर (आईएएनएस)। जम्मू-कश्मीर के बनिहाल के नचलाना तालाब में सड़क की 70 साल पुरानी मांग आखिरकार पूरी हो गई है। यहां प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के तहत 4 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण शुरू हो गया है, जिससे लगभग नचलाना तालाब गांव के 1,000 निवासियों को फायदा होगा।

तहसील खाड़ी के नचलना तालाब इलाके में सड़क बनाने का काम शुरू हो गया है। 10.81 करोड़ की लागत से बनने वाली इस 4 किलोमीटर लंबी सड़क से कनेक्टिविटी बेहतर होने और मरीजों, छात्रों और ग्रामीणों को फायदा होने की उम्मीद है।

पीडब्ल्यूडी अधिकारी ने आईएएनएस से कहा, “नाचना से तलाब सड़क की लंबाई 4 किमी है और बजट 10.81 करोड़ है। 2011 की जनगणना के मुताबिक, इस सड़क बनने से 320 लोगों को फायदा मिलता, लेकिन वर्तमान में 1 हजार लोग इससे लाभान्वित होंगे। इस सड़क पर काम शुरू हो गया है।”

स्थानीय निवासी ने कहा, “70 साल से सड़क बनाने की मांग हो रही थी। सड़क न होने के कारण बीमार पड़ने पर लोगों को अस्पताल में ले जाने में बहुत दिक्कत होती थी। इस सड़क के लिए राज्य और केंद्र सरकार धन्यवाद देता हूं। सड़क से ही गांव की तरक्की होती है। सड़क न होने से हम लोग मुख्य धारा से कटे थे। हाईवे पास होने के बाद भी शहर से हम 70 साल से कटे हुए थे। सड़क स्वीकृत होने से ग्रामीण बहुत खुश हैं। अब हमारे बच्चे आसानी से स्कूल जा सकेंगे, पहले बहुत परेशानी होती थी।”

आसिफ ने कहा, “गांव के लिए सड़क बहुत जरूरी है। यह सड़क मेरी जमीन से होकर जा रही है। सड़क के लिए मैंने अपनी जमीन बिना मुआवजे के दी है। गांव के लिए कच्ची फसल काट कर जमीन सड़क के लिए दे दी। सड़क बनने से मुश्किलें आसान हो जाएंगी, क्योंकि अभी बीमार होने पर लोगों को कंधे या चारपाई पर हाईवे तक लाना पड़ता था।”

तालाब गांव निवासी मोहम्मद शमीमनास ने कहा, “70 साल के बाद सड़क बनने से बहुत खुशी हो रही है। विधायक सजाद शाहीन और केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के प्रयासों से यह सड़क बन रही है। सड़क बनने से गांव के लोगों को बहुत राहत मिलेगी। अब किसी बीमार को अस्पताल ले जाने में दिक्कत नहीं होगी।”

तालाब गांव निवासी मोहम्मद सौमुन ने कहा, “गांव तक जाने के लिए कोई पक्की सड़क न होने से बड़ी दिक्कत हो रही थी। गांव में करीब 1500 लोग रहते हैं। ग्रामीणों को हर काम के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। अपने घर तक हर सामान कंधे पर रखकर पहुंचाना पड़ता है। बर्फबारी में बहुत दिक्कती है, लोग फंस जाते थे। अभी तक ऊपर गांव में पहुंचने में एक घंटा लग रहा है।”