नई दिल्ली, 28 अगस्त (आईएएनएस)। जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल की खरीद को लेकर विदेश मामलों के विशेषज्ञ डॉ. वाइल अव्वाद ने कहा कि यह भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिकी हथियारों की यह खरीद दोनों देशों के बीच सिर्फ खरीदार-विक्रेता के रिश्ते से आगे बढ़कर रणनीतिक गठबंधन में बदल पाएगी।
अव्वाद ने कहा, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत जो एंटी-टैंक मिसाइल खरीदना चाहता है, वह काफी महत्वपूर्ण है। हालांकि, मुद्दा यह है कि हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि अमेरिकी हथियारों की यह खरीद भारत को केवल एक खरीदार और विक्रेता के संबंध से आगे बढ़ाकर दोनों देशों के बीच एक रणनीतिक गठबंधन में बदल पाएगी या नहीं। भारत ‘मेक इन इंडिया’ के तहत निवेश चाहता है। यदि अमेरिकी हथियारों और गोला-बारूद की खरीद के साथ ‘मेक इन इंडिया’ निवेश होता है, तो उसमें प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण भी होना चाहिए। फिलहाल किसी भी अमेरिकी कंपनी को भारत को तकनीक ट्रांसफर करने के लिए आगे आते नहीं देखा गया है।”
उन्होंने कहा कि भारत दुनिया भर से हथियारों के अपने स्रोतों का विविधीकरण कर रहा है। भारत अब भी काफी हद तक रूस पर निर्भर है और उसके 60 फीसदी सैन्य उपकरण रूस से आते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने इटली, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और इजराइल से भी बड़े पैमाने पर खरीद की है। यह नया हथियार भारतीय शस्त्रागार को मजबूती देगा, जिससे भारत न केवल सैन्य रूप से बल्कि आर्थिक और राजनीतिक रूप से भी सशक्त होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किर्गिस्तान और उज्बेकिस्तान के दौरे को लेकर अव्वाद ने कहा, “शंघाई सहयोग संगठन एक बेहद महत्वपूर्ण मंच है, जहां भारत एक प्रमुख भूमिका निभा रहा है। यह सीआईएस देशों की सुरक्षा के लिए बनाया गया था और भारत अब इसका एक सक्रिय हिस्सा है। ब्रिक्स की तैयारियों के बीच यह दौरा इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वैश्विक स्तर पर भारत को एक उभरती हुई बड़ी शक्ति के रूप में मान्यता मिल रही है। एससीओ भारत को आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मदद करेगा और दक्षिण एशिया को आतंकवादी संगठनों का अड्डा बनने से रोकने में सहायक होगा।”
ब्रिक्स और एससीओ शिखर सम्मेलन को लेकर उन्होंने कहा कि चाहे ब्रिक्स हो, एससीओ हो या जी7, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की उपस्थिति देश की मजबूत स्थिति को दर्शाती है। एकध्रुवीय विश्व का दौर समाप्त हो चुका है और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है। इसके अलावा, अमेरिकी शुल्कों के प्रभाव के कारण भारत अपने एमएसएमई क्षेत्र के लिए नए बाजारों की तलाश कर रहा है। चाबहार (ईरान) के रास्ते पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए सीआईएस देशों तक सीधी पहुंच बनाना भारत का मुख्य उद्देश्य है।
नेपाल में तबाही को लेकर उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की इस आपदा को केवल मानवीय दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पर्यावरण और जन-जीवन के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। चीन, भारत, नेपाल और हिमालय साझा करने वाले सभी देशों को मिलकर एक बेहतर अर्ली वॉर्निंग सिस्टम विकसित करना चाहिए था। उपग्रह तस्वीरों से स्पष्ट होता है कि लगभग 1200 टन बर्फ का बड़ा टुकड़ा गिरने और संकरे पहाड़ी रास्तों के कारण बाढ़ और तबाही का स्तर बढ़ा है। इस आपदा में मौतों का आंकड़ा 1500 के पार जाने की आशंका है, जिसमें कई विदेशी नागरिक भी प्रभावित हुए हैं। भारत इस क्षेत्र का एक प्रमुख हितधारक है।
