Monday, June 29, 2026
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केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में एआई और डाटा साइंस में बीटेक शुरू करने की तैयारी, प्राचीन ग्रंथों को मिलेगा डिजिटल संरक्षण

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नई दिल्ली, 29 जून (आईएएनएस)। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय आधुनिक तकनीक और भारतीय ज्ञान परंपरा को एक साथ जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करने जा रहा है। विश्वविद्यालय जल्द ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डाटा साइंस में बीटेक कार्यक्रम शुरू करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इससे भारतीय भाषाओं के लिए नए एआई टूल विकसित करने, प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों के डिजिटल संरक्षण और युवाओं को आधुनिक तकनीक के साथ भारतीय विरासत से जोड़ने में मदद मिलेगी। इस पहल को लेकर समाचार एजेंसी आईएएनएस ने केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी से खास बातचीत की।

आईएएनएस से बातचीत में कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ में विश्वविद्यालय के इस प्रयास का उल्लेख किया जाना पूरे विश्वविद्यालय के लिए गर्व का विषय है। मैं प्रधानमंत्री मोदी का हार्दिक धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने विश्वविद्यालय के इस प्रयास को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई, जिससे आज पूरे भारत और विश्व का ध्यान केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय की ओर गया है। शिक्षा मंत्रालय की नई शिक्षा नीति के तहत, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के मार्गदर्शन में सभी केंद्रीय विश्वविद्यालय कार्य कर रहे हैं और उसी दिशा में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की पहल की है। यह केवल संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए ही नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक और इंजीनियरिंग के छात्रों के लिए भी एक नया अवसर लेकर आएगा।

प्रो. वरखेड़ी ने बताया कि एआई और डाटा साइंस में बीटेक शुरू करने के पीछे विश्वविद्यालय की सोच नई तकनीक और संस्कृति के बीच एक मजबूत संबंध स्थापित करना है। जब 1970 और 1980 के दशक में भारत में कंप्यूटर युग की शुरुआत हुई थी, तभी संस्कृत और संगणक के संबंध पर चर्चा प्रारंभ हो गई थी और इस दिशा में काफी कार्य भी हुआ। अब एआई के नए दौर में संस्कृत भाषा और आधुनिक भारतीय भाषाओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ जोड़ने का एक नया अवसर सामने आया है। एक केंद्रीय विश्वविद्यालय होने के नाते केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने महसूस किया कि एआई और नई तकनीकों के साथ संस्कृत का समावेश आवश्यक है। उनके अनुसार यह पाठ्यक्रम आधुनिक तकनीक और भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का एक संगम होगा।

भारतीय भाषाओं और संस्कृत के संरक्षण और एआई आधारित शोध को लेकर उन्होंने कहा कि भारत सरकार ने भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का बड़ा संकल्प लिया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी लगातार भारतीय भाषाओं को नई तकनीकों से जोड़ने पर बल देते रहे हैं। ज्ञान भारतम मिशन, डिजिटल इंडिया और नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एनआरएफ) जैसी योजनाओं के माध्यम से डिजिटल कंटेंट निर्माण में भारतीय भाषाओं को विशेष महत्व दिया जा रहा है। संस्कृत भारतीय भाषाओं की मूल और अंतर्निहित संघटक भाषा है। संस्कृत के बिना भारतीय भाषाओं की एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। भारतीय भाषाओं में तैयार होने वाले डिजिटल कंटेंट में संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका होगी, क्योंकि यह केवल ज्ञान की भाषा ही नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली सूत्र भाषा भी है।

उन्होंने कहा कि एआई तकनीक के संदर्भ में भारतीय भाषाओं पर विचार करते समय संस्कृत को अलग नहीं किया जा सकता। आने वाले समय में कंटेंट निर्माण और भाषाओं के विश्लेषण में एआई की बड़ी भूमिका होगी और इसमें संस्कृत महत्वपूर्ण योगदान देगी। यह पहल केवल भाषाओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की परिभाषाओं और अवधारणाओं को भी आधुनिक दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का अवसर बनेगी।

प्राचीन ग्रंथों और पांडुलिपियों के डिजिटल संरक्षण के संबंध में प्रो. वरखेड़ी ने कहा कि यह पहल निश्चित रूप से नई गति प्रदान करेगी। उन्होंने ज्ञान भारतम मिशन का उल्लेख करते हुए कहा कि दिल्ली में आयोजित एआई समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विभिन्न देशों के प्रधानमंत्रियों के साथ प्रदर्शनी देखने पहुंचे थे और ज्ञान भारतम की प्रदर्शनी में लगभग 18 मिनट तक रुके थे। उस दौरान उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन पांडुलिपियों में संरक्षित ज्ञान-विज्ञान के विश्लेषण तथा उसे आधुनिक ज्ञान सृजन से जोड़ने के प्रयासों की सराहना की थी। भारत की लगभग 95 प्रतिशत प्राचीन ज्ञान परंपरा आज भी पांडुलिपियों और ग्रंथागारों में सुरक्षित है, जिसे दुनिया ने अभी तक पूरी तरह नहीं देखा है। यदि इस विशाल ज्ञान भंडार को डिजिटल माध्यम और एआई तकनीक के जरिए दुनिया के सामने लाया जाता है तो यह केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नए ज्ञान के सृजन का माध्यम भी बनेगा। इससे विकसित भारत के निर्माण की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।

विश्वविद्यालय की भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते हुए वरखेड़ी ने कहा कि अब संस्कृत को केवल मंदिरों या प्राचीन भाषा के रूप में नहीं देखा जा रहा है। आज इसे भारतीय समाज के संयोजक तत्व, ज्ञान के संवाहक और आधुनिक प्रयोगशालाओं तथा तकनीक के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देखा जा रहा है। संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान का विशाल भंडार है। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने आयुष मंत्रालय के सहयोग से आयुर्वेद गुरुकुलम महाविद्यालय की योजना शुरू की है, जो सफल रही है। इसके अलावा, भारतीय विधि शास्त्र को ध्यान में रखते हुए एलएलबी कार्यक्रम प्रारंभ किया गया है और भविष्य में एलएलएम शुरू करने की भी योजना है। एआई और डाटा साइंस में बीटेक के माध्यम से विश्वविद्यालय आधुनिक तकनीक के क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है।

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में विश्वविद्यालय वास्तु और आर्किटेक्चर, एस्ट्रोनॉमिकल स्टडीज, एस्ट्रोलॉजी, एस्ट्रोफिजिक्स, प्राचीन और आधुनिक गणित के समन्वय और भारतीय प्राचीन प्रबंधन विद्या पर आधारित एमबीए कार्यक्रम शुरू करने की दिशा में भी कार्य करेगा। साथ ही, गीता आधारित काउंसलिंग और प्रबंधन शास्त्र को भी आधुनिक दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की योजना है।

प्रो. वरखेड़ी ने आगे कहा कि विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल संस्कृत के लिए नए अवसर तैयार करना नहीं है, बल्कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र को भी भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ना है। संस्कृत के साथ आधुनिक विषयों का समन्वय नवाचार और नए शोध की संभावनाओं को बढ़ाएगा। यही आत्मनिर्भर भारत, विकसित भारत और विश्वगुरु भारत के निर्माण की दिशा में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का संकल्प है।