Monday, August 10, 2026
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केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय ने बीएपीएस के विद्वान संत स्वामी भद्रेशदास को ‘वेदान्तविद्या-विश्वगुरु’ उपाधि से किया सम्मानित

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नई दिल्ली, 10 अगस्त (आईएएनएस)। केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली ने 9 अगस्त को स्वामिनारायण अक्षरधाम, नई दिल्ली में आयोजित समारोह में बीएपीएस के प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वान एवं दार्शनिक, महामहोपाध्याय स्वामी भद्रेशदास को ‘वेदान्तविद्या-विश्वगुरु’ की उपाधि प्रदान की। यह सम्मान वेदांत, संस्कृत साहित्य तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के अध्ययन, अनुसंधान और वैश्विक प्रसार में उनके योगदान की मान्यता है।

स्वामी भद्रेशदास उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता—वेदांत के इन तीन आधारभूत ग्रंथों, जिन्हें सामूहिक रूप से प्रस्थानत्रयी कहा जाता है—पर शास्त्रीय संस्कृत भाष्यों के रचयिता हैं। परम पूज्य प्रमुखस्वामी महाराज की प्रेरणा से रचित ये ग्रंथ प्रस्थानत्रयी के तीनों प्रमाणग्रंथों पर एक पूर्ण संस्कृत भाष्य-परंपरा प्रस्तुत करते हैं। परम पूज्य महंत स्वामी महाराज के मार्गदर्शन में स्वामी भद्रेशदास संस्कृत, वेदान्त और भारतीय ज्ञान-परम्परा के अध्ययन तथा वैश्विक परिचय को निरंतर आगे बढ़ा रहे हैं।

समारोह में प्रमुख आध्यात्मिक विभूतियों और संस्कृत विद्वानों ने भाग लिया। इनमें उडुपी के पेजावर अधोक्षज मठ के श्री श्री विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी; केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेडी; तथा श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर सुकांत कुमार सेनापति प्रमुख थे। प्रोफेसर वी. नारायणन, प्रोफेसर ओमनाथ बिमली, प्रोफेसर मुरलीकृष्ण, प्रोफेसर गणेश टी. पंडित और अन्य प्रतिष्ठित विद्वान भी उपस्थित रहे।

श्री श्री विश्वप्रसन्न तीर्थ स्वामीजी ने स्वामी भद्रेशदास की विद्वत्ता की सराहना करते हुए इस सम्मान का महत्त्व रेखांकित किया। प्रोफेसर वरखेडी ने संस्कृत प्रस्थानत्रयी परंपरा में अक्षर-पुरुषोत्तम दर्शन के शास्त्रीय स्वरूप को प्रतिष्ठित करने में स्वामी भद्रेशदास के योगदान को उल्लेखनीय बताया। प्रोफेसर सेनापति ने उनकी विद्वत्-यात्रा में प्रमुखस्वामी महाराज और महंत स्वामी महाराज के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन की भूमिका का उल्लेख किया। प्रोफेसर वी. नारायणन ने सम्मान-पत्र का वाचन किया, जिसका उपस्थित जनों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया।

सम्मान स्वीकार करते हुए स्वामी भद्रेशदास ने इसे भगवान स्वामिनारायण तथा अपने गुरु प्रमुखस्वामी महाराज और महंत स्वामी महाराज के चरणों में समर्पित किया।