खनन नियमों में बड़ा बदलाव, निम्न-ग्रेड के लौह अयस्क के लिए नई नीति लागू

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नई दिल्ली, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। खान मंत्रालय ने 10 अप्रैल को खनिज (परमाणु और हाइड्रोकार्बन ऊर्जा खनिजों के अलावा) रियायत (तीसरा संशोधन) नियम, 2026 अधिसूचित किया है। इसमें सीमा मूल्य से नीचे के हेमेटाइट लौह अयस्क के औसत विक्रय मूल्य (एएसपी) के प्रकाशन की कार्यप्रणाली निर्धारित की गई है, जिसमें बैंडेड हेमेटाइट क्वार्टजाइट (बीएचक्यू) और बैंडेड हेमेटाइट जैस्पर (बीएचजे) भी शामिल हैं।

किसी खनिज का सीमा मूल्य वह सीमा है, जिसके नीचे खनन के बाद प्राप्त सामग्री को अपशिष्ट के रूप में निकाला जा सकता है। हेमेटाइट लौह अयस्क के लिए अधिसूचित सीमा मूल्य 45 प्रतिशत एफई (न्यूनतम) है। देश में सीमा मूल्य से नीचे लौह अयस्क की भारी मात्रा मौजूद है, जिसमें से कुछ बीएचक्यू या बीएचजे के रूप में है, जो लौह अयस्क की प्रमुख आधार चट्टानें हैं। प्रसंस्करण और संवर्धन की तकनीक में सुधार के साथ निर्धारित सीमा से नीचे के लौह अयस्क संसाधन (बीएचक्यू और बीएचजे) उच्च श्रेणी के लौह अयस्क के संवर्धन के लिए उपयुक्त हो गए हैं। इनका उपयोग इस्पात निर्माण के लिए कच्चे अयस्क के रूप में किया जा सकता है। ऐसे निम्न श्रेणी के लौह अयस्क के संवर्धन को सुगम बनाने के लिए एक उपयुक्त नीति की आवश्यकता थी।

नियमों में वर्तमान संशोधन से पहले सीमा मूल्य से कम लौह तत्व (अर्थात 45 फीसदी से कम लौह तत्व) वाले हेमेटाइट लौह अयस्क के औसत विक्रय मूल्य (एएसपी) को प्रकाशित करने की कोई पद्धति नहीं थी, जिसमें बीएचक्यू और बीएचजे भी शामिल थे। इस प्रकार सीमा मूल्य से ऊपर के हेमेटाइट लौह अयस्क (अर्थात 45 से 51 फीसदी से कम लौह तत्व) के लिए प्रकाशित एएसपी को ही इन श्रेणियों के लिए एएसपी माना जाता था। सीमा मूल्य से कम श्रेणी पर रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम आदि लगाने के लिए उच्च श्रेणी के एएसपी का उपयोग करने से ऐसे खनिजों का लाभकारीकरण अलाभकारी हो जाता था। नियमों में वर्तमान संशोधन इस समस्या का समाधान करता है।

संशोधित नियम में यह प्रावधान है कि सीमा मूल्य से कम लौह तत्व वाले हेमेटाइट लौह अयस्क के एएसपी की गणना 35 से 45 फीसदी से कम लौह तत्व श्रेणी के लिए, औसत विक्रय मूल्य 45 से 51 से कम लौह तत्व श्रेणी के लौह अयस्क के औसत विक्रय मूल्य का पचहत्तर प्रतिशत होगा।

वहीं 35 फीसदी से कम लौह अयस्क ग्रेड के लिए औसत विक्रय मूल्य 45 से 51 फीसदी से कम लौह अयस्क ग्रेड के औसत विक्रय मूल्य के 50 प्रतिशत के बराबर होगा।

निम्न-श्रेणी के संसाधनों को उपयोग योग्य श्रेणी में लाने से उच्च-श्रेणी के लौह अयस्क संसाधनों के क्षय की चिंता का समाधान होगा और इस्पात उद्योग को खनिज की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होगी। निम्न-श्रेणी के लौह अयस्क संसाधनों का उपयोग खनिज संरक्षण के हित में होगा और साथ ही लौह अयस्क संसाधनों के वैज्ञानिक और इष्टतम खनन को बढ़ावा देगा। परिणामस्वरूप देश लौह अयस्क में आत्मनिर्भर बना रहेगा।

नियमों में संशोधन ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि खदान से निकले कच्चे अयस्क के प्रसंस्करण से उसके आर्थिक मूल्य में कमी आती है, तो प्रारंभिक छंटाई के बाद बचे हुए टुकड़ों और महीन कणों पर रॉयल्टी लागू होगी। खदान से निकला कच्चा अयस्क पट्टे के खनिज क्षेत्र से विस्फोट या खुदाई के बाद प्राप्त प्राकृतिक अवस्था में बिना संसाधित या बिना कुचले हुए कच्चे पदार्थ को संदर्भित करता है। कच्चे, असंसाधित खनिजों को संसाधित करना आवश्यक है ताकि लक्षित खनिज की सांद्रता बढ़ाई जा सके। अशुद्धियों को दूर किया जा सके और सामग्री को ऐसे रूप में परिवर्तित किया जा सके जिसे उद्योग वास्तव में उपयोग कर सकें। नियमों में वर्तमान संशोधन यह स्पष्ट करता है कि खनन से प्राप्त खनिजों के प्रसंस्करण के नाम पर उनके आर्थिक मूल्य को कम नहीं किया जा सकता है।