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‘लाल बहादुर शास्त्री बाहर से विनम्र और भीतर से चट्टान की तरह दृढ़ निश्चयी थे’, जयंती पर प्रधानमंत्री मोदी ने दी श्रद्धांजलि

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नई दिल्ली, 2 अक्टूबर (आईएएनएस)। ‘जय जवान, जय किसान’ का उद्घोष कर देश के अन्नदाता और वीर जवानों के सम्मान को नई ऊचाइयां प्रदान करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री ‘भारत रत्न’ लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है। पीएम मोदी ने कहा कि उनकी सादगी और देश के प्रति समर्पण आज भी बेहद प्रेरणादायक है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा, “लाल बहादुर शास्त्री जी को श्रद्धांजलि, जिनकी सादगी और देश के प्रति समर्पण आज भी बेहद प्रेरणादायक है।”

साथ ही, एक संदेश में पीएम मोदी ने कहा, “एक लाल बहादुर शास्त्री आए, जिन्होंने ‘जय जवान-जय किसान’ का मंत्र दिया और हिंदुस्तान का किसान उठ खड़ा हो गया।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “शास्त्री जी का नाम आते ही हम भारतवासियों के मन में एक असीम श्रद्धा का भाव उमड़ पड़ता है। उनका सौम्य व्यक्तित्व हर देशवासी को सदा ही गर्व से भर देता है। लाल बहादुर शास्त्री की यह विशेषता थी कि वह बाहर से अत्यधिक विनम्र दिखते थे और भीतर से चट्टान की तरह दृढ़ निश्चयी थे। राष्ट्र के प्रति उनकी निस्वार्थ तपस्या का ही प्रतिफल था कि लगभग डेढ़ वर्ष के संक्षिप्त कार्यकाल में वे देश के जवानों और किसानों को सफलता के शिखर पर पहुंचने का मंत्र दे गए।”

बता दें कि 9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक देश के प्रधानमंत्री रहे लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। स्वतंत्रता संग्राम में लाल बहादुर शास्त्री की भूमिका अडिग रही। 1921 से ही वे कांग्रेस से जुड़े और गांधीजी के नमक सत्याग्रह (1930) में सक्रिय भागीदारी की।

ब्रिटिश जेलों में कुल नौ वर्ष बिताए, जहां उन्होंने पश्चिमी दार्शनिकों, क्रांतिकारियों और समाज सुधारकों की किताबें पढ़कर अपने विचारों को समृद्ध किया। जेल से बाहर आकर उन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनकी देशभक्ति का प्रमाण यह था कि वे कभी पद या सत्ता के भूखे नहीं रहे बल्कि जनसेवा को अपना धर्म मानते थे।

9 जून 1964 को जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने। उनका कार्यकाल मात्र 19 महीने का था, लेकिन चुनौतियों से भरा रहा। 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड़ गया। सीमाओं पर सैनिकों की वीरता और खाद्य संकट के बीच शास्त्री जी ने ‘जय जवान-जय किसान’ का नारा दिया, जो आज भी प्रासंगिक है।