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महाराष्ट्र में असमान रही मानसूनी बारिश, मराठवाड़ा में 40 प्रतिशत तक कमी : आईएमडी

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मुंबई, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र में इस साल मानसून की बारिश का वितरण असमान रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के निदेशक बिक्रम सिंह ने बताया कि जून से सितंबर तक चलने वाले मानसून सीजन में राज्य में कुल वार्षिक बारिश का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त होता है, हालांकि इस बार बारिश का वितरण सभी क्षेत्रों में समान नहीं रहा और मराठवाड़ा समेत कुछ इलाकों में बारिश की कमी दर्ज की गई है।

आईएमडी के निदेशक बिक्रम सिंह ने समाचार एजेंसी आईएएनएस से बात करते हुए बताया कि मानसून की शुरुआत जून में कमजोर रही। जून के अंतिम सप्ताह विशेषकर 23 से 25 जून के बाद बारिश की गतिविधियां शुरू हुईं। इस दौरान उत्तरी महाराष्ट्र और कोंकण-गोवा क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक बारिश हुई, जबकि मराठवाड़ा में बारिश कम रही।

उन्होंने बताया कि जुलाई में महाराष्ट्र में अच्छी बारिश हुई। जुलाई के एक सप्ताह को छोड़कर अधिकांश समय बारिश सामान्य से अधिक रही। मौसम विभाग के अनुसार, पूरे मानसून सीजन में जुलाई ऐसा महीना रहा, जब राज्य को अपेक्षाकृत अच्छी बारिश मिली।

उन्होंने कहा कि अगस्त और सितंबर में बारिश की गतिविधियों में फिर कमी देखने को मिली। इन महीनों में महाराष्ट्र के अधिकांश हिस्सों में बारिश सामान्य से कम रही। कोंकण-गोवा और मध्य महाराष्ट्र के कई हिस्सों में कुल मानसूनी बारिश सामान्य सीमा के आसपास रही, लेकिन मराठवाड़ा और विदर्भ के कुछ हिस्सों में बारिश की कमी गंभीर रही।

बिक्रम सिंह ने बताया कि मराठवाड़ा क्षेत्र में बारिश की कमी करीब 40 प्रतिशत तक रही है। हिंगोली जिले में करीब 49 प्रतिशत, जालना में लगभग 48 प्रतिशत और धाराशिव में करीब 45 प्रतिशत बारिश की कमी दर्ज की गई। इसके अलावा विदर्भ के अमरावती, वाशिम और अन्य कुछ जिलों में भी बारिश सामान्य से कम रही।

उन्होंने बताया कि 30 सितंबर तक के 17 सप्ताह के मानसून काल में कई क्षेत्रों में केवल पांच से छह सप्ताह ही ऐसे रहे, जब बारिश सामान्य या सामान्य से अधिक रही। बाकी 11 से 12 सप्ताह में बारिश सामान्य से कम या कमी वाले स्तर पर रही।

मौसम विभाग के निदेशक ने बारिश के असमान वितरण के कारण जलस्रोतों पर संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि लगातार और सामान्य बारिश होने से भूजल, नदियों और जलधाराओं का पुनर्भरण होता है, जिससे पूरे वर्ष पानी की उपलब्धता बनी रहती है। इस बार जुलाई में तेज बारिश से कुछ जलस्रोतों में पानी तो आया, लेकिन भारी बारिश के कारण तेज बहाव बढ़ा और पानी के जमीन में रिसकर भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम प्रभावी रही।

उन्होंने कहा कि लगातार बारिश न होने से आने वाले महीनों में नदियों और जलधाराओं में पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका असर कृषि, पेयजल और जलविद्युत उत्पादन पर भी पड़ सकता है।

बिक्रम सिंह ने कहा कि ऐसी स्थिति में सिंचाई और जलापूर्ति से जुड़े विभागों को पानी के उपयोग और उपलब्धता का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना होगा। सिंचाई के तरीकों, जलापूर्ति और संभावित पानी की कटौती जैसे विषयों पर समय रहते योजना बनानी होगी।

उन्होंने कहा कि मराठवाड़ा समेत बारिश की कमी वाले क्षेत्रों में कृषि पर इसका असर पड़ने की आशंका है। बारिश की कमी और उसके असमान वितरण को देखते हुए आने वाले महीनों में जल प्रबंधन और उपलब्ध संसाधनों के विवेकपूर्ण इस्तेमाल पर विशेष ध्यान देना जरूरी होगा।