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महाराष्ट्र में एसआईआर सफल रही, लेकिन वास्तविक मतदाता प्रभावित न हों : संजय निरुपम

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मुंबई, 15 अक्टूबर (आईएएनएस)। महाराष्ट्र में एसआईआर प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई पर शिवसेना (शिंदे गुट) के प्रवक्ता संजय निरुपम ने प्रतिक्रिया दी है। साथ ही उन्होंने धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के मामले में मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी समर्थन किया।

महाराष्ट्र में एसआईआर के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस पर संजय निरुपम ने कहा कि वह कोर्ट की सुनवाई का स्वागत करते हैं। उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र में एसआईआर प्रक्रिया को सफलतापूर्वक लागू किया गया था और यह अभी चल रही है, हालांकि इस प्रक्रिया के पहले और दूसरे चरण के दौरान यह देखा गया कि लगभग 2 करोड़ 7 लाख मतदाताओं को मैप या सूचीबद्ध नहीं किया जा सका। हमें भी यह आंकड़ा बहुत बड़ा दिखा।”

उन्होंने आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए कहा, “जब हमने विस्तार से अध्ययन किया तो पाया कि करीब 37 लाख वोटर इसमें मर चुके हैं। करीब 17-18 लाख वोटर के नाम तीन-चार जगह पर हैं। करीब 70-75 लाख वोटर एक से दूसरे जगह शिफ्ट हो चुके हैं, मतलब उनके नाम दो बार रिपीट हैं। लाखों में उन वोटर्स के नाम हैं, जो उस समय घर पर मौजूद नहीं थे, जब बीएलओ उनके घर गए।”

निरुपम ने कहा कि आने वाले समय में सुप्रीम कोर्ट इस पूरे प्रकरण की सुनवाई करेगा। उन्होंने कहा, “हम भी नहीं चाहते कि एसआईआर के बहाने किसी भी वास्तविक वोटर का नाम कटे और कोई भी अधिकारी मनमानी हरकत करे, जिससे कोई वोट देने से वंचित रह जाए। हम सुप्रीम कोर्ट की याचिका का सम्मान करते हैं। कोर्ट जो भी फैसला करेगा, वह स्वीकार्य है।”

धर्म परिवर्तन और आरक्षण के संबंध में मद्रास हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगने पर भी निरुपम ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि कई लोग धर्म बदलने के बाद भी आरक्षण का लाभ लेते रहते हैं, जो गलत है।

निरुपम ने कहा, “कई हिंदू विशेष रूप से पिछड़ी जातियों या अनुसूचित जातियों के लोग, चर्चों या मिशनरियों के बहकावे में आकर दूसरे धर्मों में परिवर्तित हो जाते हैं। इसके बावजूद वे भारत में मौजूद आरक्षण व्यवस्था का लाभ लेना जारी रखते हैं। उनका तर्क है कि चूंकि वे मूल रूप से एससी श्रेणी से थे, इसलिए इस्लाम या ईसाई धर्म में परिवर्तित होने के बाद भी वे एससी ही बने रहते हैं।”

उन्होंने कहा, “मद्रास हाईकोर्ट ने इस धारणा को खारिज कर दिया है और स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति, जो पहले पिछड़ी जाति का हिंदू था, किसी अन्य धर्म में परिवर्तित हो जाता है, तो वह अब किसी भी श्रेणी के अंतर्गत नहीं आता है।”