नई दिल्ली, 30 अगस्त (आईएएनएस)। यह कहानी है भारत के 13वें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की, जिनकी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव रहे, लेकिन नंबर 13 के साथ उनका लगाव अधिकतर मौकों पर देखा गया। संयोग कहिए या कुछ और, नंबर 13 एक तरीके से उनके लिए जिंदगी का ‘लकी नंबर’ बनकर रहा।
11 दिसंबर 1935 को पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के एक छोटे से गांव मिराती में जन्मे प्रणब मुखर्जी उन लोगों में शामिल नहीं रहे जो 13 नंबर को अशुभ मानते हैं।
जब वह सांसद के तौर पर तालकटोरा रोड वाले बंगले में रहने गए थे तो कई लोगों ने उन्हें चेतावनी दी थी कि नंबर 13 अशुभ होता है, लेकिन तब से प्रणब मुखर्जी का करियर सिर्फ ऊपर ही गया। इतना लकी कि कई सालों से बड़े घर का हकदार होने के बावजूद उन्होंने 13 तालकटोरा रोड वाले अपने साधारण से घर को छोड़ने से इनकार कर दिया।
प्रणब मुखर्जी ने एक इंटरव्यू में अपने सीधे-सादे अंदाज में कहा था कि वह अंधविश्वास में यकीन नहीं रखते। उन्होंने कहा, “हिंदू शास्त्रों में नंबर 13 असल में शुभ माना जाता है, क्योंकि इसका मतलब त्रयोदशी होता है। अगर आप उस दिन कोई काम करते हैं तो उसके अच्छे और सकारात्मक नतीजे मिलते हैं।”
तालकटोरा रोड वाला घर ही एकमात्र ऐसी जगह नहीं है जहां नंबर 13 का प्रणब मुखर्जी से नाता रहा। संसद भवन में उनका ऑफिस भी कमरा नंबर 13 ही था।
शर्मिष्ठा मुखर्जी ने एक इंटरव्यू में बोला था, “मेरे पिता की जिंदगी में 13 नंबर का कुछ विशेष महत्व है। नंबर 13 उनके लिए एक लकी नंबर था। मेरे माता-पिता की सालगिराह 13 जुलाई रही। उन्होंने राज्यसभा सदस्य के रूप में पहली बार 13 जुलाई को शपथ ली थी। फिर 13 नंबर से उनका संबंध तालकटोरा रोड के साथ रहा। इस जगह वे 10 साल रहे।”
उनकी जिंदगी का एक किस्सा यह भी है कि 1940 से 1945 के दौरान वे स्कूल नहीं गए। इसकी बजाए वे खेलने, पेड़ों पर चढ़ने और चरने के लिए निकली गौओं के झुंड के साथ भागने में अधिक व्यस्त रहे। 1946 में, किरनाहर के शिबचंद्र हाई इंग्लिश स्कूल में पांचवीं कक्षा में उनका नाम लिखवाया गया। उस इलाके का यह जाना-माना स्कूल उनके घर से ढाई किलोमीटर की दूरी पर था। इसका मतलब था कि उन्हें हर रोज पांच किलोमीटर पैदल चलना होता था और वह भी खाली पांव, जो उन दिनों एक आम बात थी। उनकी यात्रा का अधिकतर भाग एक ऐसी पगडंडी से होकर जाता था, जिसके दोनों ओर गड्ढे होते।
बरसात के दिनों में, जब सारा इलाका कई फीट गहरे पानी में डूब जाता, तो वे अपने जूते और निक्कर उतार लेते थे और एक गमछा पहनकर, पानी को तैरकर पार किया करते थे। फिर ऊंची भूमि पर आने के बाद वे अपनी स्कूली वर्दी में दोबारा आ जाते थे। हालांकि, 1973 में जब वे मंत्री थे, तब उन्होंने उस पगडंडी को पक्का करवाया। प्रणब दा ने इसका उल्लेख अपनी आत्मकथा में किया।
एक और रोचक घटना यह थी कि एक दिन, एक पुलिस दल प्रणब दा के घर का सारा सामान जब्त करने पहुंचा था। प्रणब दा के पिता स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले सभी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। इसी कारण पुलिस दल उनके यहां आया था। तब प्रणब मुखर्जी की उम्र महज 8 साल थी।
परिवार को पहले से ही चेतावनी मिल गई थी, इसलिए उन्होंने गांव के अलग-अलग लोगों के घर अपना कीमती सामान, अनाज और पशु आदि भिजवा दिए थे। इसी तरह प्रणब दा के पिता के सभी कागज व दस्तावेज भी पड़ोस में सुरक्षित थे।
जब सब-इंस्पेक्टर को जब्त करने के लिए कुछ खास नहीं दिखा, तो उसने प्रणब दा से पूछा, “तुम्हारे घर में तो गाय थीं। मैंने स्वयं उन्हें देखा है। वे अब कहां गईं?” इस पर प्रणब दा ने बहुत ही मासूमियत के साथ जवाब दिया, “गाय? उन्हें तो हम खा गए।” यह सुनकर सब-इंस्पेक्टर दंग रह गया। उसने फिर से बोला, “तुम हिंदू हो और तुम अपनी गाय खा गए?” इस पर प्रणब मुखर्जी ने कहा, “दरअसल पिताजी बहुत समय से जेल में हैं, इसलिए हमने अपना पेट भरने के लिए गाय बेच दीं।”
उनके जिंदगी के सफर की बात करें तो प्रणब मुखर्जी ने कोलकाता विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री और कानून की डिग्री प्राप्त की थी। इसके बाद उन्होंने एक कॉलेज में शिक्षक और पत्रकार के रूप में कार्य प्रारंभ किया। अपने पिता के राष्ट्रीय आंदोलन में दिए गए योगदान से प्रेरित होकर प्रणब दा ने सार्वजानिक जीवन में प्रवेश किया और 1969 में राज्यसभा के लिए चुने जाने के बाद वे पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन के प्रति समर्पित हो गए।
प्रणब दा ने 1973-75 के दौरान उद्योग, पोत-परिवहन और परिवहन, इस्पात और उद्योग उप मंत्री व वित्त राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया। उन्होंने 1982 में पहली बार भारत के वित्त मंत्री के रूप में पदभार संभाला और वे 1980 से 1985 तक राज्यसभा में सदन के नेता रहे। वे 1991 से 1996 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष के साथ, 1993 से 1995 तक वाणिज्य मंत्री और 1995 से 1996 तक विदेश मंत्री रहे। वे 2004 से 2006 तक रक्षा मंत्री रहे। उन्होंने एक बार फिर 2006 से 2009 तक विदेश मंत्री और 2009 से 2012 तक वित्त मंत्री के रूप में कार्य किया। वह 2004 से 2012 तक लोकसभा में सदन के नेता रहे।
प्रणब मुखर्जी ने 25 जुलाई 2012 को भारत के राष्ट्रपति का पद संभाला और अपना 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया। राष्ट्रपति के रूप में प्रणब दा ने इस उच्च पद की गरिमा को बढ़ाया और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मामलों पर अपने विद्वतापूर्ण और मानवीय दृष्टिकोण की छाप छोड़ी। मुखर्जी एक अगाध पुस्तक प्रेमी थे। उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्र निर्माण पर कई पुस्तकें लिखी हैं। उन्हें अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से सम्मानित किया गया, जिनमें 1997 में सर्वश्रेष्ठ सांसद, 2008 में पद्म विभूषण और 2019 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न शामिल है। 31 अगस्त 2020 को 84 वर्ष की आयु में प्रणब मुखर्जी का निधन हुआ।
