नई दिल्ली, 7 अगस्त (आईएएनएस)। आयुष मंत्रालय के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने नई दिल्ली में राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान (एनआईएसआर) की दूसरी शासी निकाय बैठक की अध्यक्षता की और भारतीय हिमालयी क्षेत्र (आईएचआर) में वैज्ञानिक अनुसंधान, अकादमिक उत्कृष्टता, संस्थागत विकास और विस्तार के माध्यम से सोवा-रिग्पा को मजबूत करने के लिए एक रणनीतिक रोडमैप की रूपरेखा प्रस्तुत की।
संस्थान की आगामी वर्षों के लिए प्राथमिकताओं को निर्धारित करते हुए केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव ने इस बात पर जोर दिया कि विकास के अगले चरण में वैज्ञानिक अनुसंधान को मजबूत करने, अंतरराष्ट्रीय मानकों को बढ़ावा देने और सोवा-रिग्पा की पहुंच को इसकी पारंपरिक भौगोलिक सीमाओं से परे विस्तारित करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
शासी निकाय को संबोधित करते हुए प्रतापराव जाधव ने कहा कि हमारा लक्ष्य अब केवल बुनियादी ढांचे के विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि सोवा-रिग्पा को भारत और विश्व भर में एक मुख्यधारा की स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में स्थापित करना है। हमारी सर्वोपरि प्रतिबद्धता सोवा-रिग्पा को साक्ष्य-आधारित चिकित्सा विज्ञान प्रणाली के रूप में विश्व के समक्ष स्थापित करना है। इसे प्राप्त करने के लिए, हमें अपनी अनुसंधान रणनीतियों को गति देनी होगी, और एक स्वतंत्र अनुसंधान परिषद की स्थापना पहला महत्वपूर्ण कदम होगा। हमें साक्ष्य-आधारित अनुसंधान, सशक्त शैक्षणिक संस्थानों और विश्व स्तर पर स्वीकृत मानकों के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक उत्कृष्टता के साथ एकीकृत करने वाला एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना होगा।
प्रतापराव जाधव ने आगे कहा कि मेरा दृढ़ विश्वास है कि राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान केवल लद्दाख की संस्था नहीं है। यह पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र की चिकित्सा विरासत का संरक्षक है। हमें इसके क्षेत्रीय मॉडल को मजबूत करना चाहिए और हिमालयी समुदायों के साथ अपने जुड़ाव को गहरा करना चाहिए। दुर्लभ औषधीय पौधों की सतत खेती, जैव-अन्वेषण, कृषि वानिकी और औषधीय जैव विविधता के संरक्षण पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि स्थानीय समुदाय इस अमूल्य ज्ञान प्रणाली के संरक्षण और संवर्धन में समान भागीदार बन सकें। आइए, मिलकर इस संस्थान को समग्र स्वास्थ्य के वैश्विक केंद्र में बदलें।
जाधव ने सुझाव दिया कि सोवा-रिग्पा के अमूल्य ज्ञान और विरासत से युक्त सैकड़ों भोटी भाषा की पांडुलिपियों को व्यवस्थित प्रतिलेखन और अनुवाद के माध्यम से संरक्षित किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि प्रथम चरण के रूप में, इन पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण किया जाए, जिसके बाद इनका अनुवाद किया जाए ताकि ज्ञान का यह समृद्ध भंडार आम जनता और शोधकर्ताओं के लिए सुलभ हो सके। उन्होंने आगे प्रस्ताव दिया कि डिजिटलीकरण अभियान को एनआईएसआर, ज्ञान भारतम मिशन या किसी अन्य सक्षम संस्था द्वारा किए जाने वाले कार्य से तेज किया जाए, और यदि आवश्यक हो, तो संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से भी कार्य किया जाए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस अमूल्य ज्ञान का संरक्षण और डिजिटलीकरण भारत की पारंपरिक चिकित्सा विरासत की रक्षा और सोवा-रिग्पा में भविष्य के अनुसंधान को मजबूत करने के लिए आवश्यक है।
आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि मंत्रालय भारत के पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को संरक्षित करने और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के माध्यम से इसे आगे बढ़ाने वाले सशक्त संस्थानों के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने उल्लेख किया कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, नैदानिक सेवाओं, अनुसंधान और क्षमता निर्माण के माध्यम से सोवा-रिग्पा को बढ़ावा देने में एनआईएसआर एक प्रमुख संस्थान के रूप में उभरा है, और इसके दीर्घकालिक विकास के लिए मंत्रालय के निरंतर सहयोग और प्रतिबद्धता को भी दोहराया।
शासी निकाय ने राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान के निदेशक डॉ. पद्म गुरमेट को चिकित्सा क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान, विशेष रूप से भारत में प्राचीन सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति के पुनरुद्धार, संरक्षण और संस्थागतकरण में उनके अग्रणी प्रयासों के लिए 2026 में पद्म श्री से सम्मानित किए जाने पर बधाई दी। सदस्यों ने शिक्षा, अनुसंधान, नैदानिक सेवाओं और संस्थागत विकास के माध्यम से सोवा-रिग्पा को आगे बढ़ाने में उनके नेतृत्व की सराहना की।
डॉ. पद्मा गुरमेट ने शासी निकाय के समक्ष संस्थान की प्रगति और भविष्य की कार्य योजना प्रस्तुत की। उन्होंने अकादमिक, नैदानिक सेवाओं, अनुसंधान, औषधीय पौधों के संरक्षण और आउटरीच कार्यक्रमों में हासिल की गई उपलब्धियों पर प्रकाश डाला, साथ ही संस्थागत क्षमता को और मजबूत करने तथा सोवा-रिग्पा की पहुंच को देश भर में विस्तारित करने के उद्देश्य से प्रस्तावों की रूपरेखा भी प्रस्तुत की।
सोवा-रिग्पा, जिसका भोटी भाषा में अर्थ है ‘चिकित्सा का ज्ञान’, विश्व की सबसे प्राचीन पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में से एक है और इसे भारत सरकार द्वारा आयुष कार्यक्रम के अंतर्गत मान्यता प्राप्त है। आम तौर पर आमची चिकित्सा प्रणाली के रूप में जानी जाने वाली यह प्रणाली भारतीय हिमालयी क्षेत्र और कई पड़ोसी देशों में प्रचलित है। सदियों से, यह प्रणाली ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में विकसित और फली-फूली है और आज पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान का एक समृद्ध भंडार है।
शासी निकाय ने सोवा-रिग्पा में शिक्षा, अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवा के सर्वोच्च संस्थान के रूप में राष्ट्रीय सोवा-रिग्पा संस्थान को सशक्त बनाने के उद्देश्य से प्रमुख नीतिगत, शैक्षणिक और अनुसंधान पहलों पर विचार-विमर्श किया। आयुष मंत्रालय ने वैज्ञानिक प्रमाणीकरण, संस्थागत उत्कृष्टता और व्यापक जन संपर्क के माध्यम से इस प्राचीन हिमालयी चिकित्सा परंपरा को आगे बढ़ाने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

